टमाटर की खेती

टमाटर - फल और सब्जी दोनो ही श्रेणियों में आता है। टमाटर की शरदकालीन फसल के लिए जुलाई से सितम्बर, बसंत या ग्रीष्मकालीन फसल के लिए नवम्बर से दिसम्बर तथा पहाड़ी क्षेत्रों में मार्च से अप्रैल महीनों में बीज की बुआई फायदेमंद होती है। स्वादिष्ट होने के साथ साथ, टमाटर स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।


टमाटर

टमाटर उगाने वाले क्षेत्र

यह भारत की महत्तवपूर्ण व्यापारिक फसल है। यह फसल दुनिया भर में आलू के बाद दूसरी सब से महत्वपूर्ण फसल है।इस फसल की प्रमुख पैदावार बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, महांराष्ट्र,आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिमी बंगाल में की जाती है। जलवायु और तापमान :-पुष्पन और फल बनने के समय भारी बारिश, बादल नुकसानकारक हैं क्योंकि यह फूलों और फलों के गिरने का कारण बनता है। ये पौधे पाला और अधिक नमी का सामना नहीं कर पाते हैं। अधिक नमी के कारण फल सड जाते हैं। फल बनने के समय तेज धूप के कारण गहरे लाल रंग के फल विकसित होते हैं। 10°C से कम तापमान के कारण पौधे का विकास रुक जाता है। यदि तापमान 35°C से अधिक हो तो फलों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। प्रारंभिक वृद्धि अवस्था पर 38°C से अधिक तापमान से विकास रुक जाता है। टमाटर के लिए आदर्श तापमान 20-25°C तक होता है।

टमाटर की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

टमाटर में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए, विटामिन सी, के साथ-साथ विटामिन बी 6, फोलेट और थाइमिन की महत्वपूर्ण मात्रा भी शामिल होती है।

बोने की विधि

नर्सरी की तैयारी :- पौध रोपाई से एक महीना पहले मिट्टी को धूप में खुला छोड़ दें। 1 एकड़ क्षेत्र के लिए 3 मीटर लंबाई और 1 मीटर चौड़ाई तथा 15 सेमी ऊंचाई की छः क्यारियाँ तैयार करें। बीज 2-3 सेंटीमीटर गहरे और 10 सेंटीमीटर की दूरी पर कतार में बोएं और मिट्टी से ढक दें। क्यारियों को अंकुरण तक प्रतिदिन दो बार और अंकुरण के बाद एक बार पानी दें। बुवाई के बाद बैडों को प्लास्टिक शीट से ढक दें और फूलों को पानी देने वाले डब्बे से रोज़ सुबह बैडों की सिंचाई करें। बीमारियों के हमले से फसल को बचाने के लिए नर्सरी वाले बैडों को अच्छे नाइलोन के जाल से ढक दें। प्रत्यारोपण से 4-5 दिन पहले क्यारियों में पानी की मात्रा कम करें ताकि पौधे सख्त हों और प्रत्यारोपण से एक दिन पहले हल्की सिंचाई करें। प्रोट्रे में नर्सरी तैयार करें :- कोकोपीट - 1.2 किलो प्रति प्रोट्रे के साथ भरें। प्रोट्रे में उपचारित बीज एक खाने में 1 बीज के दर से बोएं। बीज को कोकोपीट से ढक दें और अंकुरण शुरू होने तक (5 दिन) प्रोट्रे को एक के ऊपर एक रखें और पॉलीथीन शीट से ढंक दें । 6 दिनों के बाद, अंकुरित बीज वाले हर एक प्रोट्रे को शेड नेट के अंदर उभरी हुई ऊँची क्यारियों में रखें। पौधशाला में 25-30 दिन बाद पौधे तैयार हो जाते हैं और इनके 3-4 पत्ते निकल आते हैं। यदि पौधों की आयु 30 दिन से ज्यादा हो तो इसके उपचार के बाद इसे खेत में लगायें। पौध उखाड़ने के 24 घंटे पहले बैडों को पानी लगायें ताकि पौधे आसानी से उखाड़े जा सकें। रोपाई से पहले जडो को उपचारित करें :- 40 ग्राम मैंकोजेब 75 % डब्लू पी  + 40 मिली इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस ल  20 लीटर पानी में मिलाएँ। रोपाई से पहले जड़ों को घोल में डुबोएं। प्रोट्रे में पौधों के लिए 5 मिनट के लिए कंटेनर में प्रोट्रे डुबोएं। रोपाई का समय:- उत्तरी राज्यों में सालभर टमाटर की खेती की जाती है। पतझड़ के समय नर्सरी की रोपाई जुलाई-अगस्त में की जाती है और अगस्त-सितंबर में यह खेत में लगा दी जाती है। पहाड़ी इलाकों में इसकी बिजाई मार्च-अप्रैल में की जाती है और अप्रैल-मई में यह खेत में लगा दी जाती है। किस्म और विकास के ढंग के मुताबिक 60 x 30 सैं.मी. या 75 x 60 सैं.मी. या 75 x 75 सैं.मी. की दूरी रखें। नर्सरी में बीजों को 4 सैं.मी. गहराई में बोयें और मिट्टी से ढक दें।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

टमाटर के पौधे लगाने के लिए अच्छी जोताई और समतल मिट्टी की जरूरत होती है। मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए 4-5 बार जोताई करें। फिर मिट्टी को समतल करने के लिए सुहागा लगाएं। आखिरी बार हल से जुताई करते समय इसमें अच्छी किस्म की गोबर की खाद और कार्बोफ़्यूरोन 4 किलो प्रति एकड़ या नीम केक 8 किलो प्रति एकड़ डालें। टमाटर की फसल को बैड बनाकर लगाया जाता है, जिसकी चौड़ाई 80-90 सैं.मी. होती है। मिट्टी के अंदर रोगाणुओं, कीटों और जीवों को नष्ट करने के लिए मिट्टी को सूरज की किरणों में खुला छोड़ दें। पारदर्शी पॉलीथीन की परत भी इस काम के लिए प्रयोग की जा सकती है। यह परत सूर्य की किरणों को सोखती है, जिससे मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है और यह मिट्टी के अंदरूनी रोगाणुओं को मारने में सहायक होती है।

बीज की किस्में

टमाटर के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

अच्छी भूमि और जलवायु के साथ साथ अच्छी किस्म के बीज का होना भी जरुरी होता है । US 2853 :-टमाटर की पहली फसल पौध लगाने के 70 दिन बाद मिल जाती है ।इस वैरायटी पर फूल और पत्तियां काफी आती है । एक टमाटर का औसत वजन 100 से 110 ग्राम तक होता है ।इस वैरायटी के टमाटर गोल और कड़े होते है । इस वैरायटी के टमाटर की सेल्फ लाइफ बहुत अच्छी होती है। ये किस्म लीफ कर्ल वायरस के प्रतिरोधी है । युवराज (BSS 1006): इस वैरायटी के टमाटर गोल होते है। इसके टमाटर का वजन 120 ग्राम हो जाता है। पहली टमाटर की फसल 65 दिन में मिल जाती है । इस वैरायटी को खरीफ या रबी दोनों सीजन में लगा सकते है। ये वैरायटी विल्ट और अन्य बीमारियों के प्रतिरोधी है। इसका स्वाद खट्टा है और ये वैरायटी दोनों सीजन में लगाई जा सकती है । अर्का रक्षक F1 :-इस वैरायटी में अर्ली ब्लाइट, लीफ कर्ल वायरस व् बैक्टीरियल विल्ट के प्रतिरोधी है। इसके टमाटर का रंग गहरा लाल और वजन 80 से 100 ग्राम होता है । प्रति पौधा 12 से 15 किलो किलो की पैदावार होती है।ये वैरायटी 140 से 150 दिन की है। प्रति एकड़ 40 से 48 टन की पैदावार देती है ।पौध लगाने के 65-70 दिन में टमाटर की फसल देती है । ये वैरायटी ज्यादा उत्पादन देती है और लम्बे समय तक चलती है । टमाटर सख्त व् समान आकार के होते है । हिम सोहना (Heemsohna) :- ये वैरायटी फैलने वाली है और ज्यादा टहनिया आती है ।इस वैरायटी के टमाटर का वजन 90-100 ग्राम तक होता है । इसके टमाटर समान आकार के व सख्त होते है । टमाटर की पहली फसल 65-75 दिन में तैयार हो जाती है । ज्यादा दूरी के ट्रांसपोर्टटेशन के लिए ये वैरायटी अच्छी है। इसका उत्पादन भी अच्छा है। पंजाब रेड चेरी:- यह किस्म पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार की गई है। इस किस्म को खास सलाद के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका रंग गहरा लाल होता है और भविष्य में यह पीले, संतरी और गुलाबी रंग में भी उपलब्ध होगी। इसकी बिजाई अगस्त या सितंबर में की जाती है और फरवरी में यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह जुलाई तक पैदावार देती है। इसकी अगेती पैदावार 150 क्विंटल प्रति एकड़ और कुल औसतन पैदावार 430 - 440 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। पंजाब सर्वना:-यह किस्म 2018 में जारी हुई है। इसके पत्ते गहरे हरे रंग के होते हैं। इसके फल अंडाकार, संतरी रंग के और दरमियाने होते हैं। इस किस्म की पहली तुड़ाई रोप लगाने के 120 दिनों के बाद की जाती है। मार्च के अंत तक इस किस्म की औसतन पैदावार 166 क्विंटल प्रति एकड़ और कुल उपज 1087 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म सलाद के तौर पर प्रयोग करने के लिए अनुकूल है। HS 102 :-यह किस्म जल्दी पक जाती है। इस किस्म के टमाटर छोटे और दरमियाने आकार के गोल और रसीले होते हैं। स्वर्णा वैभव हाइब्रिड:-इस किस्म की सिफारिश पंजाब, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में की जाती है। इसकी बुवाई सितंबर-अक्तूबर में की जाती है। इसकी क्वालिटी लंबी दूरी वाले स्थानों पर ले जाने और अन्य उत्पाद बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है। इसकी औसतन पैदावार 360-400 क्विंटल प्रति एकड़ है। स्वर्णा संपदा हाईब्रिड:-इस किस्म की सिफारिश पंजाब, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में की जाती है। इसकी बुवाई के लिए अनुकूल समय अगस्त-सितंबर और फरवरी-मई है। यह झुलसा रोग और पत्तों के मुरझाने की रोधक किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 400-420 क्विंटल प्रति एकड़ है। स्वर्णा नवीन- इस प्रजाति की बुवाई जुलाई से सितंबर एवं अप्रैल से मई माह में की जा सकती है, यह प्रजाति जीवाणु जनित उकठा रोग के प्रति सहनशील है। स्वर्ण लालिमा - इस प्रजाति की बुवाई जुलाई से सितंबर एंव फरवरी से अप्रैल माह में की जा सकती है। काशी अमन- इस प्रजाति की उपज क्षमता 300-400 क़्वींटल प्रति एकड़ है। प्रजाति विषाणु जनिक पर्ण र्कुंचन रोग के प्रति सहनशील है।

बीज की जानकारी

टमाटर की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

बीज दर: एक एकड़ के लिए नर्सरी तैयारी के लिए सामान्य क़िस्मों 100 से 150 ग्राम बीज और हाइब्रिड क़िस्म के लिए 80 से 100 बीज की मात्रा का प्रयोग करें। बीजोपचार: फसल को बीज जनित मृदा जनित बीमारियों से बचाने के लिए बीजों को बुवाई से पहले कार्बेनडाज़िम 50 % डब्लूपी  3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। इसके बाद ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। बीज को छांव में रख दें और फिर बुवाई के लिए प्रयोग करें।

बीज कहाँ से लिया जाये?

बीज सदैव किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

टमाटर की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

टमाटर की अच्छी व गुणवत्ता युक्त फसल लेने के लिए भूमि में पोषक तत्वों की उचित मात्रा होनी चाहिए। उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण के परिणाम के आधार पर तय किया जाना चाहिए। टमाटर मे उचित पोषण प्रबंधन के लिए कम्पोस्ट खाद का उपयोग उचित रहता है। उर्वरकों का अनुपात - एनपीके 70:35:35 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें। नत्रजन :- 77 किलो यूरिया प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं और 38 किलो यूरिया रोपाई के 30 से 35 दिन बाद और 38 किलो यूरिया 45 से 50 दिन बाद खड़ी फ़सल में डालें। फॉस्फोरस :- 218 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। पोटाश :- 60 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (mop) प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। जड़ों के अच्छे विकास के लिए पोटाश की जरूरत होती है। घुलनशील पोषक तत्व :-रोपाई के 10-15 दिन बाद 19:19:19 के साथ सूक्ष्म तत्वों को 2.5-3 ग्राम प्रति लीटर में मिलाकर स्प्रे करें। कम तापमान के कारण पौधे तत्वों को कम सोखते हैं और इससे पौधे के विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। इस तरह की स्थितियों में फोलियर स्प्रे पौधे के विकास में मदद करती है। शाखाएं और टहनियां निकलने के समय 19:19:19 या 12:61:00 की 4-5 ग्राम प्रति लीटर स्प्रे करें। पौधे के अच्छे विकास और पैदावार के लिए पनीरी लगाने के 40-50 दिन बाद 10 दिनों के फासले पर ब्रोसिनोलाइड 50 मि.ली. प्रति एकड़ को 150 मि.ली. प्रति एकड़ को 150 लीटर पानी में मिलाकर दो बार स्प्रे करें। टमाटर के अच्छे उत्पादन के लिए :- अच्छी क्वालिटी और पैदावार प्राप्त करने के लिए फूल निकलने से पहले 12:61:00 मोनो अमोनियम फासफेट 10 ग्राम प्रति लीटर का स्प्रे करें।जब फूल निकलने शुरू हो जाएं तो शुरूआती दिनों में बोरेन 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी का स्प्रे करें। यह फूल और टमाटर के झड़ने को रोकेगा। कईं बार टमाटरों पर काले धब्बे देखे जा सकते हैं जो कैल्शियम की कमी से होते हैं। इसको रोकने के लिए कैल्शियम नाइट्रेट 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का स्प्रे करें। अधिक तापमान में फूल गिरते दिखें तो एन ए ए 50 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी का स्प्रे फूल निकलने पर करें। टमाटर के विकास के समय पोटाश और सलफेट (00:00:50+18S) की 3 - 5 ग्राम प्रति लीटर का स्प्रे करें। यह टमाटर के विकास और बढ़िया रंग के लिए उपयोगी होती है। टमाटर में दरार आने से इसकी क्वालिटी कम हो जाती है और मूल्य भी 20 प्रतिशत कम हो जाता है। इसे रोकने के लिए चिलेटड बोरेन 200 ग्राम प्रति एकड़ प्रति 200 लीटर पानी का स्प्रे फल पकने के समय करें। पौधे के विकास, फूल और फल को बढ़िया बनाने के लिए बायोज़ाइम धनज़ाइम 3-4 मि.ली. प्रति लीटर पानी का स्प्रे महीने में दो बार करें। मिट्टी में नमी बनाये रखें।

जलवायु और सिंचाई

टमाटर की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

सर्दियों में 6 से 7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें और गर्मियों के महीने में मिट्टी में नमी के मुताबिक 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। फूल निकलने के समय सिंचाई महत्वपूर्ण होती है। इस समय पानी की कमी से फूल झड़ सकते हैं और फल के साथ साथ पैदावार पर भी प्रभाव पड़ता है। बहुत सारी जांचों के मुताबिक यह पता चला है कि हर पखवाड़े में आधा इंच सिंचाई करने से जड़ें ज्यादा फैलती हैं और इससे पैदावार भी अधिक हो जाती है।

रोग एवं उपचार

टमाटर की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

हानिकारक कीट और बीमारियों की रोकथाम :- पत्ते का सुरंगी कीड़ा :- यह कीट पत्तों को खाते हैं और पत्ते में टेढी मेढी सुरंगे बना देते हैं। यह फल बनने और प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर भी असर करता है। शुरूआती समय में नीम सीड करनल एक्सट्रैक्ट 5 प्रतिशत 50 ग्राम लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। इस कीड़े पर नियंत्रण करने के लिए डाईमैथोएट 30 ई सी 250 मि.ली.या स्पीनोसैड 80 मि.ली.में 200 लीटर पानी या ट्राइज़ोफोस 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें। सफेद मक्खी: यह पत्तों में से रस चूसकर पौधों को कमज़ोर बनाती है। यह शहद की बूंद की तरह के पत्तों पर काले धब्बे छोड़ती है। यह पत्ता मरोड़ बीमारी का भी कारण बनता हैं। नर्सरी में बीजों की बिजाई के बाद, बैड को 400 गैसकेनाइलोन जाल के साथ या पतले सफेद कपड़े से ढक दें। यह पौधों को कीड़ों के हमले से बचाता है। इनके हमले को मापने के लिए पीले फीरोमोन कार्ड प्रयोग करें, जिनमें ग्रीस और चिपकने वाला तेल लगा हों। सफेद मक्खी को फैलने से रोकने के लिए प्रभावित पौधों को जड़ों से उखाड़कर नष्ट कर दें। ज्यादा हमला होने पर एसिटामिप्रिड 20 एस पी 80 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी या प्रोफैनोफोस 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यह स्प्रे 15 दिन बाद दोबारा करें। फल छेदक : यह टमाटर का मुख्य कीट है। यह हेलीकोवेरपा के कारण होता है, जिसे सही समय पर यदि कंट्रोल न किया जाये तो यह 22-37 प्रतिशत तक फसल को नुकसान पहुंचाता है। यह पत्ते, फूल और फल खाता है। यह फलों पर गोल छेद बनाता है और इसके गुद्दे को खाता है। शुरूआती नुकसान के समय इसके लार्वा को हाथों से भी इकट्ठा किया जा सकता है। शुरूआती समय में HNPV या नीम के पत्तों का घोल 50 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। फल बेधक को रोकने के लिए फेरोमोन कार्ड बराबर दूरी पर पौध लगाने के 20 दिनों के बाद लगाएं और प्रभावित हिस्सों को नष्ट कर दें। यदि कीड़ों की गिनती ज्यादा हो तो सपानोसैड 80 मि.ली.+ स्टिकर 400 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। शाख और फल बेधक को रोकने के लिए कोराज़न 60 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। फल का गलना :- यह टमाटर की प्रमुख बीमारी है जो मौसम के परिवर्तन के कारण होती है। टमाटरों पर पानी के फैलाव जैसे धब्बे बन जाते हैं। फल गलने के कारण बाद में यह काले और भूरे रंग में बदल जाते हैं। बिजाई से पहले बीजों को ट्राइकोडरमा 5-10 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम या थीरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। यदि खेत में इसका प्रकोप दिखे तो प्रभावित और नीचे गिरे हुए फल और पत्ते इकट्ठे करके नष्ट कर दें। यह बीमारी ज्यादातर बादल वाले मौसम में पाई जाती है। इसे रोकने के लिए मेंकोजेब 400 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 300 ग्राम या क्लोरोथैलोनिल 250 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यह स्प्रे 15 दिन बाद दोबारा करें। ऐंथ्राक्नोस :- गर्म तापमान और ज्यादा नमी वाली स्थिति में यह बीमारी ज्यादा फैलती है। इस बीमारी से पौधे के प्रभावित हिस्सों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं। यह धब्बे आमतौर पर गोलाकार, पानी के साथ भीगे हुए और काली धारियों वाले होते हैं। जिन फलों पर ज्यादा धब्बे हों, वे पकने से पहले ही झड़ जाते हैं जिससे फसल की पैदावार में भारी गिरावट आ जाती है। यदि इस बीमारी का प्रकोप दिखे तो इसे रोकने के लिए प्रॉपीकोनाज़ोल या हैक्साकोनाज़ोल 200 मि.ली. प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। झुलसा रोग :- यह टमाटर की खेती में आम पाई जाने वाली प्रमुख बीमारी है। शुरू में पत्तों पर छोटे भूरे धब्बे होते हैं। बाद में ये धब्बे तने और फल के ऊपर भी दिखाई देते हैं। पूरी तरह विकसित धब्बे भद्दे और गहरे भूरे हो जाते हैं जिनके बीच में गोल सुराख होते हैं। ज्यादा प्रकोप होने पर इसके पत्ते झड़ जाते हैं। यदि इसका हमला देखा जाये तो मैनकोज़ेब 400 ग्राम या टैबूकोनाज़ोल 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर में मिलाकर स्प्रे करें। पहले स्प्रे से 10-15 दिनों के बाद दोबारा स्प्रे करें। बादलवाइ वाले मौसम में इसके फैलने का ज्यादा खतरा होता है। इसे रोकने के लिए क्लोरोथैलोनिल 250 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। अचानक होने वाली वर्षा भी इस बीमारी के बढ़ने में मदद करती है, इसे रोकने के लिए कॉपर वाले फंगसनाशी - 300 ग्राम प्रति लीटर, स्ट्रैपटोसाइकलिन - 6 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी का स्प्रे करें। उकठा रोग - संक्रमित पौधों की पत्तियाँ तथा शाखाएं पीली पड़ जाती हैं । कभी-कभी एक शाखा या पौधे के एक तरफ का भाग प्रभावित हो जाता है। संक्रमित पौधे सूख जाते हैं। लक्षण अक्सर पहली फलत के दौरान प्रकट होते हैं। बीज को उपचारित करके ही बोना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

टमाटर की फसल को 45 दिनों तक खेत को खरपतवारों से रहित रखें। यदि खरपतवार नियंत्रण से बाहर हो जायें तो यह 70-90 प्रतिशत पैदावार कम कर देंगे। पौध रोपाई के 2-3 दिन बाद फ्लूकोरेलिन 800 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे रोपाई से पहले वाले खरपतवार नाशक के तौर पर करें। यदि खरपतवार जल्दी उग रहे हों तो खरपतवार नाशक के तौर पर सैंकर 300 ग्राम प्रति एकड़ की स्प्रे करें। खरपतवारों पर नियंत्रण रखने के लिए ज़मीन का तापमान कम करने के लिए पॉलीथीन की परत / मल्चिंग शीट का प्रयोग कर सकते हैं।

सहायक मशीनें

देशी हल या हैरों, खुरपी, फावड़ा, आदि