गन्ना की खेती

गन्ना भारत का स्वदेशी फल है। यह चीनी, गुड़ और खांडसारी का मुख्य स्रोत है। वर्तमान में गन्ना उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। देश में सभी मीठा कारकों के लिए गन्ना महत्वपूर्ण पदार्थ है। गन्ना एक प्रमुख व्यवसायिक फसल है। विषम परिस्थितियां भी गन्ना की फसल को बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर पाती। इन्ही विशेष कारणों से गन्ना की खेती अपने आप में सुरक्षित व लाभ की खेती है।


गन्ना

गन्ना उगाने वाले क्षेत्र

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आदि देश के प्रमुख गन्ना उत्पादन वाले राज्य है। गन्ने के सर्वोत्तम जमाव के लिये 30-35 डिग्री से. वातावरण तापक्रम उपयुक्त है। उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में तापक्रम वर्ष में दो बार ​सितम्बर-अक्टूबर एवं फरवरी-मार्च में आता है। जलवायु और तापमान :- गर्म और नम जलवायु व गर्म लंबे दिन अधिक फुटाव, रस और उच्च सुक्रोज सामग्री के साथ पौधों का उत्पादन करते हैं। अंकुरण अवस्था- 30-35°C। वनस्पति की वृद्धि- 20-30°C। पकने की अवस्था - 12-15°C। उच्च तापमान जैसे 50°C इसकी वृद्धि को रोक देता है और 20°C से नीचे बहुत कम तापमान इसके विकास को धीमा कर देता है। 25-30°C के तापमान में फफूंद की बीमारी बढ़ती हे। इसी प्रकार लाल सड़न रोग का प्रसार उच्च तापमान (37-40°C) पर अधिक होता है।

गन्ना की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

गन्ने के रस में कैल्शियम, पोटैशियम, आयरन और मैग्नेशियम, आदि विभिन्न तत्व पाए जाते हैं।

बोने की विधि

समतल विधि :- इस विधि में 90 सेमी के अन्तराल पर 7-10 सेंमी गहरे कुंड डेल्टा हल से बनाकर गन्ना बोया जाता है। वस्तुतः यह विधि साधारण मृदा परिस्थितियों में उन कृषकों के लिये उपयुक्त हैं जिनके पास सिंचाई, खाद तथा श्रम के साधन सामान्य हों। बुवाई के उपरान्त एक भारी पाटा लगाना चाहिये। नाली विधि :- इस विधि में बुवाई के एक या डेढ़ माह पूर्व 90 सेमी के अन्तराल पर लगभग 20-25 से०मी० गहरी नालियॉं बना ली जाती हैं। इस प्रकार तैयार नाली में गोबर की खाद डालकर सिंचाई व गुडई करके मिट्टी को अच्छी प्रकार तैयार कर लिया जाता है। जमाव के उपरान्त फसल के क्रमिक बढवार के साथ मेड की मिट्टी नाली में पौधे की जड़ पर गिराते हैं जिससे अन्ततः नाली के स्थान पर मेड तथा मेड के स्थान पर नाली बन जाती हैं जो सिंचाई नाली के साथ-साथ वर्षाकाल में जल निकास का कार्य करती है। यह विधि दोमट भूमि तथा भरपूर निवेश-उपलब्धता के लिये उपयुक्त है। इस विधि से अपेक्षाकृत उपज होती है, परन्तु श्रम अधिक लगता है। दोहरी पंक्ति विधि :- इस विधि में 90-30-90 से०मी० के अन्तराल पर अच्छी प्रकार तैयार खेत में लगभग 10 से०मी० गहरे कूंड बना लिये जाते हैं। यह विधि भरपूर खाद पानी की उपलब्धता में अधिक उपजाऊ भूमि के लिये उपयुक्त है। इस विधि से गन्ने की अधिक उपज प्राप्त होती है। बुवाई का समय :- गन्ने की बुवाई साल में दो बार की जाती है। शरदकालीन बुवाई :- अक्टूबर-नवम्बर में फसल की बुवाई करते हैं और फसल 10-14 माह में तैयार होती है। बसंत कालीन बुवाई :- फरवरी से मार्च तक फसल की बुवाई करते है और फसल 10 से 12 माह में तैयार होती है। शरदकालीन गन्ने, बसंत में बोये गये गन्ने से 25-30 प्रतिशत व ग्रीष्मकालीन गन्ने से 30-40 प्रतिशत अधिक पैदावार देता है। बीजोपचार :- बीज जनित रोग व कीट नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम 2 ग्रा/ लीटर पानी व क्लोरोपायरीफॉस 5 मि.ली./ली की दर से घोल बनाकर आवश्यक बीज का 15 से 20 मिनट तक उपचार करें। एरीटान 6 प्रतिशत या एगलाल 3 प्रतिशत से भी बीज को उपचारित कर सकते है।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

दोमट भूमि जिसमें गन्ने की खेती सामान्यत: की जाती है, में 12 से 15 प्रतिशत मृदा नमी अच्छे जमाव के लिये उपयुक्त है। यदि मृदा नमी में कमी हो तो इसे बुवाई से पूर्व पलेवा करके पूरा किया जा सकता है। ओट आने पर मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई तथा 2-3 उथली जुताइयॉं करके खेत में पाटा लगा देना चाहिये। खेत में हरी खाद देने की ​स्थिति में खाद को सड़ने के लिये पर्याप्त समय (लगभग एक से डेढ़ माह) देना चाहिये। मृदा उपचार :- ट्राईकोडर्मा विरडी 2 कि.ग्रा./ एकड़ 75 कि.ग्रा. वर्मी कम्पोस्ट के साथ मिश्रित कर एक या दो दिन नम रखकर बुवाई पूर्व कूड़ों में या प्रथम गुड़ाई के समय भुरकाव करने से कवकजनित रोगों से राहत मिलती है। गोबर की खाद :- मृदा की भौतिक दशा सुधारने, मृदा से हयूमस स्तर बढ़ाने व उसे संरक्षित रखने, मृदा में सूक्ष्म जीवाणु गतिविधियों के लिये आदर्श वातावरण बनाये रखने के साथ ही निरन्तर फसल लिये जाने, रिसाव व भूमि क्षरण के कारण मृदा में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से हरी खाद, एफ.वाइ.एम. कम्पोस्ट, सडी प्रेसमड आदि का प्रयोग किया जाना चाहिये। हरी खाद के लिये शीघ्र बढने वाली दलहनी फसलों जैसे सनई, ढैंचा, लोबिया आदि को चुनना चाहिये। 1 माह पूर्व खेत तैयारी के समय 4 टन गोबर खाद, 2 किलो एन फिक्सिंग बैक्टीरिया, 2 किलो पी सॉल्युबलाइजिंग बैक्टीरिया प्रति एकड़ सभी को मिलाएं और मिश्रण करें इसे रोटावेटर के साथ 6 इंच गहरे गड्ढे में डाले।

बीज की किस्में

गन्ना के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

शीघ्र से पकने वाली जातियां -को०शा० 8436 को०शा० 88230 को०शा० 95255 को०शा०96268 को०शा० 03234 यू०पी० 05125 को०से० 98231 को०शा० 08272 को०से० 95422 को० 0238 को० 0118 को० 98014, आदि देर से पकने वाली जातियां - को०शा० 767 को०शा० 8432को०शा० 97264 को०शा० 96275 को०शा० 97261 को०शा० 98259 को०शा० 99259 को०से० 01434 यू०पी० 0097 को०शा० 08279 को०शा० 08276 को०शा० 12232 को०से० 11453 को० 05011, को०शा०09232, आदि

बीज की जानकारी

गन्ना की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

एक एकड़ गन्ने के खेत की बुवाई हेतु दो से तीन आंख वाले गन्ने के लगभग 20,000 टुकड़े की आवश्यकता पड़ती है। इनकी मोटाई के आधार पर लगभग 25 से 30 कुंतल प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।

बीज कहाँ से लिया जाये?

गन्ने का बीज किसी विश्वनीय स्थान से खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

गन्ना की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

गन्ने की फसल पोषक तत्वों की भारी मात्रा में अवशोषण करती है। मिट्टी में पोषक तत्वों की सही जानकारी के लिए मृदा परीक्षण करना आवश्यक होता है। गन्ने की अच्छी फसल हेतु एनपीके अनुपात 80:40:40 प्रति एकड़ दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई के समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फॉस्फोरस तथा पोटाश की संपूर्ण मात्रा का प्रयोग उचित रहता है शेष नाइट्रोजन गन्ना बोने के 2 माह बाद खड़ी फसल में टॉपड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करना चाहिए। यूरिया :- 88 किलों प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत मिलाएं व टॉप ड्रेसिंग के रूप में खड़ी फ़सल में 2 माह बाद 88 किलों यूरिया का छिड़काव प्रति एकड़ करें। फॉस्फोरस :-50 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं। पोटाश :- 68 किलों म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं।

जलवायु और सिंचाई

गन्ना की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

सिंचाई की संख्या, बुवाई की विधि, खाद की मात्रा, मृदा एवं जलवायु के अनुसार कम व अधिक होती है। गर्मी के दिनों में भारी मिट्टी वाले खेतों में 8-10 दिन के अंतर पर एवं ठंड के दिनों में 15 दिनों के अंतर से सिंचाई करें। हल्की मिट्टी वाले खेतों में 5-7 दिनों के अंतर से गर्मी के दिनों में व 10 दिन के अंतर से ठंड के दिनों में सिंचाई करना चाहिये। सिंचाई की मात्रा कम करने के लिये गरेड़ों में गन्ने की सूखी पत्तियों की पलवार की 10-15 से.मी. तह बिछायें। गर्मी में पानी की मात्रा कम होने पर एक गरेड़ छोड़कर सिंचाई देकर फसल बचावें। कम पानी उपलब्ध होने पर ड्रिप (टपक विधि) से सिंचाई करने से भी 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है। गर्मी के मौसम तक जब फसल 5-6 महीने तक की होती है स्प्रींकलर (फव्वारा) विधि से सिंचाई करके 40 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है। वर्षा के मौसम में खेत में उचित जल निकास का प्रबंध रखें। खेत में पानी के जमाव होने से गन्ने की बढ़वार एवं रस की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

रोग एवं उपचार

गन्ना की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

01. गन्ने का लाल सड़न रोग - इस बीमारी से ग्रस्त पौधे की पत्तियों के बीच में छोटे-छोटे धब्बे बन जाते हैं और यह धब्बे संपूर्ण पत्ती पर फैल जाते हैं। पत्तियां सूख जाती हैं एवं गन्ने के अन्दर का भाग लाल रंग का दिखाई देता है। इसके नियंत्रण के लिए रोगरोधी जातियों को उगाना चाहिए। फसल चक्र अपनाना चाहिए व स्वास्थ्य बीज बुवाई के लिए प्रयोग करना चाहिए। रोग ग्रस्त फसल की पेड़ी नहीं रखनी चाहिए। बीज को एग्लाल दवा से उपचारित करना चाहिए। 02. गेरुई - इस रोग के प्रकोप के कारण पौधों के तने पतले हो जाते हैं। ऊपर से काली पत्तियाँ निकलती हैं तथा अप्रैल के बाद पर्णविन्यास पंखे की तरह हो जाती हैं। प्रभावित फसल पर 0.2% डाइथेन एम-45 के घोल का छिड़काव लाभदायक होता है। 03. सूखा रोग - इस रोग के प्रकोप से गन्ने सूखने लगते हैं तथा पौधे पीले पड़ जाते हैं। यह रोग लाल सड़न के साथ अधिक मिलता है और फसल को क्षति पहुंचाता है। इसकी रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्में बोना और उचित फसल चक्र अपनाना तथा टुकड़ों के सिरों को एग्लाल 0.5% या एरीटॉन के घोल में भिगोना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

गन्ने में खरपतवार नियंत्रण हेतु समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। अंधी गुड़ाई :- गन्ने का अंकुरण देर से होने के कारण कभी-कभी खरपतवारों का अंकुरण गन्ने से पहले हो जाता है। जिसके नियंत्रण हेतु एक गुड़ाई करना आवश्यक होता है जिसे अंधी गुड़ाई कहते है। निराई गुड़ाई :- आमतौर पर प्रत्येक सिंचाई के बाद एक गुड़ाई ओट आने पर करनी चाहिए इस बात का विशेष ध्यान रखें कि वृद्धिअवस्था (90-100 दिन) तक निराई-गुड़ाई का कार्य करें। श्रमिकों की कमी की स्थिति में गन्ने की बढवार के प्रारम्भ में दो बैलों अथवा ट्रैक्टर चलित कल्टीवेटर द्वारा अप्रैल जून में गुडई करनी चाहिए। रसायनिक नियंत्रण :- बुवाई से 20 दिन पहले पहले ग्लायफोसेट 41 % SL 600 मिली/एकड़ छिड़काव करें। बुवाई के 3 दिनों तक अंकुरण पूर्व खरपतवारों के नियंत्रण हेतु एट्राज़िन 600 ग्राम/एकड़ या मेट्रिब्यूजिन 400 ग्राम/एकड़ छिड़काव करें। रोपाई के 21 दिनों के  बाद 2,4-डी 1 किलो/एकड़ छिड़काव करें। खड़ी फ़सल मोथा घास के नियंत्रण के लिए हालोसल्फुरोन मिथाइल (सेम्प्रा नाम से बाज़ार में आती है।) 75% WG 36 gm प्रति एकड़ का छिड़काव करें।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल या हैरों, या कल्टीवेटर हरी, फावड़ा, कुदाल आदि यंत्रो की आवश्यकता होती है।