कद्दू की खेती

भारत में इसकी खेती बहुत ही पुराने समय से होती चली आ रही है। इसकी सब्जी का उत्तरी भारत में शादी-विवाह या किसी भी अन्य उत्सव के समय, भोजन में मुख्य स्थान होता है। इसका फल दवाओं के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसके फल के अतिरिक्त इसकी नई कोमल पत्तियों तथा फूलों को भी सब्जी के लिए प्रयोग किया जाता है।


कद्दू

कद्दू उगाने वाले क्षेत्र

 कद्दू की बुवाई देश के सभी हिस्सों में की जा सकती है लेकिन इसका सबसे ज्यादा उत्पादन तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में होता है.

कद्दू की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

नमी-92.6 ग्राम, वसा-00.1 ग्राम, रेशा-0.07 ग्राम, कैलोरीज-25 ग्राम,मैग्नीशियम-14मिग्रा., लोहा-00.7मिग्रा., पोटेशियम-139 मिग्रा., सल्फर-16मिग्रा., विटामिन ए-84 I.U., रिवोफ्लेविन-0.04 मिग्रा, विटामिन सी-2 मिग्रा., प्रोटीन-1.4 ग्राम, खनिज पदार्थ-0.6 ग्राम, अन्य कार्बोहाइड्रेट 4.6 ग्राम, फास्फोरस-30मिग्रा, सोडियम-5.6 मिग्रा, कॉपर-0.2 मिग्रा, क्लोरीन-4 मिग्रा, थियामीन-0.06 मिग्रा, निकोटिनिक अम्ल-0.5 मिग्रा।

बोने की विधि

(1)ग्रीष्म ऋतु की फसलों के लिए- लाइन से लाइन की दूरी 1.5-2.5 मीटर तथा पौध से पौध की दूरी 70 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। (2) वर्षा ऋतु की फसल के लिए लाइन से लाइन की दूरी 1.5 मीटर से 2.5 मीटर तथा पौध से पौध की दूरी 1 मीटर रखनी चाहिए।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

यह सभी प्रकार की भूमि में, जिसमें जलनिकास की उचित व्यवस्था हो,उगाई जा सकती है। पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करने के बाद 2-3 जुताई देशी हल या हैरों से करके पाटा लगा देना चाहिए।

बीज की किस्में

कद्दू के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

(1) सीताफल - बड़ा लाल, बड़ा गोल, पीले गूदेवाली,लाल गूदेवाली। उन्नतशील जातियां- अर्का चन्दन, आई.एच.आर.93-1-1-1, पूसा विश्वास, सी.एम-14 । चपन कद्दू - अर्ली एलो प्रोलीफिक, आस्ट्रेलियन ग्रीन,बटरनट तथा हिसार सेलेक्शन-1, पूसा अलंकार । (3) विलायती कद्दू - अर्का सूर्यमुखी, ग्रीन हुबर्ड, गोल्डन हुबर्ड ।

बीज की जानकारी

कद्दू की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

एक हेक्टेयर की बुवाई के लिए 6 से 8 किलो बीज पर्याप्त होता है 100 ग्राम में लगभग 600 बीज होते हैं।

बीज कहाँ से लिया जाये?

कद्दू का बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

कद्दू की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

सामान्य रूप से 25-30 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद को खेत को तैयार करते समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। इसके बाद 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर के हिसाब से देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा बोते समय तथा नाइट्रोजन की शेष बची हुई आधी मात्रा बोने के 1-1.5 माह बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में जड़ों के पास देना चाहिए।

जलवायु और सिंचाई

कद्दू की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

सामान्यतः वर्षा ऋतु की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती, परन्तु यदि खेत में नमी कम हो तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। ग्रीष्म ऋतु की फसल में 4-5 दिन के अन्तराल से सिंचाई करते रहना चाहिए।

रोग एवं उपचार

कद्दू की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

(1) पाउडरी मिल्ड्यू  - इस बीमारी के प्रकोप से पोधों की पत्तियों एवं तने पर सफेद धब्बे हो जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए कैराथेन 500 मिली लीटर या कैलीकासीन 800 ग्राम या सल्फेक्स 3 किलो या वैबीस्टीन 1 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए एक सप्ताह के अंतराल पर। (2) डाउनी मिल्ड्यू (Downy Mildew) - इस रोग के प्रकोप से पत्तियों के ऊपर पीला या लाल भूरा धब्बा पड़ जाता है। इस रोग की रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 के 0.2% घोल का छिड़काव करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण हेतु सिंचाई से पहले 2-3 निकाई करना चाहिए।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल या हैरों, फावड़ा, खुर्पी आदि यंत्रो की आवश्यकता होती है।