बाजरा की खेती

बाजरे की फसल चारे और दाने के लिए बोई जाती है। यह पशुओं का भोजन है तथा मनुष्य भी इसके दाने की रोटियां और खिचड़ी बनाकर शरद ऋतु में खाते हैं। इसके अतिरिक्त इसकी बाल को भी भूनकर खाया जाता है। बाजरे के लिए नम तथा गर्म जलवायु उपयुक्त रहती है। तथा फसल में फूल आने पर स्वच्छ वायुमंडल, गर्म मौसम की आवश्यकता होती है।


बाजरा

बाजरा उगाने वाले क्षेत्र

भारतवर्ष में बाजरे की खेती सबसे अधिक राजस्थान में होती है। इसके अतिरिक्त इसकी खेती महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि राज्यों में भी की जाती है।मिटटी और जलवायु :-इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की भूमि पर हो सकती है परंतु यह जल भराव के प्रति सवेदनशील है । इसकी खेती के लिये बालू दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो, सर्वाधिक अनुकूल पायी गयी है । इसकी खेती गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में जहां 400-650 मिली मीटर बारिश हो करना लाभदायक है । अधिक तेज धूप और कम वर्षा के कारण जहां पर ज्वार की खेती संभव नहीं है वहां के लिये बाजरा एक अच्छी वैकल्पिक फसल है । बाजरा के लिए 20-30 सेंटीग्रेट तापमान सबसे उचित है । यह एसिडिक सोइल के प्रति संवेदनशील है ।

बाजरा की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

इसमें प्रोटीन तथा अमीनो अम्ल पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं, इसमे कैंसर कारक टाक्सिन नहीं बनते है, जो कि मक्का तथा ज्वार में बन जाते हैं।

बोने की विधि

बुवाई की विधि :- पौधे से पौधे की दुरी 12-15 सेंटीमीटर तथा कतार से कतार की दुरी 45-50 सेंटीमीटर ।जहां कम वर्षा होती है वहां पर बुवाई जुलाई के शुरूआत में करना उचित होगा । जहां थोड़ी ज्यादा वर्षा होती है वहां पर जुलाई के अंत में बुवाई करने से मौनसूनी वर्षा के परागण पर होने वाले नुकसान से फसल बची रहती है ।सामान्य तौर पर बीजों की बुवाई छिडकाव विधि से की जाती है । बुवाई के तीन सप्ताह बाद पौधे से पौधे 15 सेंटीमीटर एवं कतारों के बीच 45-50 सेंटीमीटर की दूरी रखकर पौधों की छटाई कर देनी चाहिए ।जहां पर जमाव नही हुआ वहां पर उखाड़े गये पौधों की रोपाई भी कर देनी चाहिए । बाजरा की बुवाई सीड ड्रील मशीन से भी की जा सकती है ।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

खेत तैयारी के लिए पहले मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई (लगभग 15 सेमी) करनी चाहिए। स्थानीय क़िस्मो के लिए 4 से 5टन प्रति एकड़ सादे गोबर की खाद डाले ।इसके बाद 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए जिससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाये तथा खेत पर पटेला लगाकर खेत को समतल कर देना चाहिए।दीमक सूखे इलाके का प्रमुख कीट है ।अंतिम जुताई के समय कार्बोफुरान (3G) का 10 किग्रा या कॉरटाप हाइड्राक्लोराइड (4G) का 7.5 किग्रा/एकड़ प्रयोग करे ।

बीज की किस्में

बाजरा के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

बायर क्रॉप साइंस :-9444 बाजरा की यह किस्म राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के लिए अच्छी है। 80 से 85 दिन का समय लेती है । अच्छी पैदावार देती है ।9450 बायर की यह किस्म राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लिए अच्छी है। तैयार होने में 85 से 90 दिन का समय लेती है । डाउनी मिल्ड्यू, रस्ट,ब्लास्ट और लोगिंग (lodging) के प्रतिरोधी किस्म है । उपजाऊ भूमि के लिए अच्छी किस्म है ।7701 गुजरात राजस्थान और उत्तरप्रदेश के लिए । 75 से 80 दिन का समय लेती है। XL-51 महारष्ट्र, गुजरात, कर्नाटका, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु के लिए । हलकी मिटटी के लिए ।9330 9343 महाराष्ट्र, और दक्षिण पश्चिम उत्तर प्रदेश के लिए ।तेजस राजस्थान और हरियाणा के लिए उपयुक्त किस्म है । जल्दी पककर तैयार ( 65-70 ) हो जाती है । Mahyco Tower (MRB-2210) , Caliber (MRB-204), MRB-२२४० जे.के.एग्री जेनेटिक्स :- JKBH-26, JKBH-778(80-85 दिन में तैयार हो जाती है पौधे की ऊंचाई 240 से 250 cm तक होती है , 2 से 3 tiller होते है )। गंगा कावेरी :-GK-1111 (मध्यम लेट अवधि की किस्म और लम्बी किस्म है ) , GK-1116 (मध्यम अवधि ) Rasi Seeds :- Rasi-1818 (80 से 84 दिन , टिलर ज्यादा होते है ), 1827 (84 से 87 दिन ,कटाई तक हरी रहती है। श्रीराम बायोसीड बायोसीड B-70 (68 से 70 दिन), 8141 (82 से 85 दिन), 8850(80 से 85 दिन), 8142(82 से 85 दिन , पौधे की लम्बाई 210 से 220 cm, 2 से 3 टिलर), 8494(78 से 80 दिन), नुजीवीडू सीड्स :-सुधा 2223, सोनी-227, एनबीएच 2123 रेवती, 1024 बादशाह, स्नेहा- 1132, 1134 प्रताप, 216 सुबीज एक्सप्रेस, 2340 कीर्तिपायोनियर सीड्स पायोनियर :-86M88 ये वैरायटी लीफ ब्लास्ट और रस्ट के प्रति सहनशील है ।86M11 यह माध्यम अवधि की वैरायटी है। ज्यादा पैदावार देने वाली किस्म है । इसके पत्ते चौड़े होते है और चारे की पैदावार भी अधिक देती है।86M86 यह किस्म भी माध्यम अवधि की है और अच्छा उत्पादन देती है ।86M35 यह किस्म जल्दी पकने वाली है ।86M74, 86M84 ये भी अच्छी किस्मे है अच्छा उत्पादन देती है ।बाजरा मैनपुर, बाजरा घाना, बाजरा बाबापुरी, बाजरा फतेहाबाद-1, बाजरा एस-530, पी.एच.बी.-10 एच. बी.-5 एच.एच.बी-60, एम.पी.-15।

बीज की जानकारी

बाजरा की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

(i) दाने के लिए1.5 से 2 किलोग्राम / एकड़ । (ii) चारे के लिए 5 से 6 किलोग्राम / एकड़ ।

बीज कहाँ से लिया जाये?

बाजरे का बीज किसी विश्वसनीय स्थान से खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

बाजरा की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

खाद एवं उर्वरक :-अधिक उपज वाली क़िस्मो के लिए मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करे । 1. देसी जातियों के लिए - 40किग्रा नाइट्रोजन, 30किग्रा फास्फोरस प्रति एकड़ देना चाहिए। 👉 नत्रजन :- 44 किलो यूरिया बुवाई के समय और खड़ी फसल में 25 दिन बाद 22 किलो यूरिया व 40 दिन बाद 22 किलो यूरिया प्रति एकड़ टॉप ड्रेसिंग के रूप में डालें । 👉 फॉस्फोरस :- 188 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं। 2. संकर जातियों के लिए - 50किग्रा नाइट्रोजन, 40 किग्रा फास्फोरस, प्रति एकड़ देना चाहिए। 👉 नत्रजन :- 55 किलो यूरिया बुवाई के समय और खड़ी फसल में 35 दिन बाद 55 किलो यूरिया प्रति एकड़ टॉप ड्रेसिंग के रूप में डालें । 👉 फॉस्फोरस :- 250 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं। 👉सामान्य तौर पर सिंचित अवस्था में 100-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-60 किलोग्राम फास्फोरस, 30-40 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है । 👉वर्षाधारित खेती में लगभग आधी मात्र की आवश्यकता होती है । 👉सिंचित खेती में 70 किलोग्राम यूरिया, 55 किग्रा डीएपी या 90 किलोग्राम यूरिया, 150 किलोग्राम (एसएसपी) सिगल सूपर फॉस्फेट प्रति एकड आवश्यक है । इसमें आवश्यकतानुसार पोटाश का प्रयोग किया जा सकता है । नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फेट तथा पोटाश की पूरी मात्र खेत तैयारी में प्रयोग करें ।

जलवायु और सिंचाई

बाजरा की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

अधिकांश क्षेत्रों में बाजरे की फसल वर्षा पर निर्भर करती है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं वहां पर यदि वर्षा न हो तो 2 - 3 सिंचाई करनी चाहिए। जिससे खेत में पर्याप्त नमी बनी रहे।

रोग एवं उपचार

बाजरा की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

1. हरित बाल रोग - यह रोग फफूंदी से उत्पन्न होता है। इसे बाजरे का रोमिल फफूंदी या मृदु रोमिल आसिता रोग भी कहते हैं। इसमें बालियों के स्थान पर टेढ़ी-मेढ़ी हरी पत्तियां निकल आती हैं जिस कारण बालियां झाड़ू के समान प्रतीत होने लगती हैं। इस रोग के उपचार के लिए रोगी पौधों को काट कर जला देना चाहिए तथा बीज को बोते समय थाइरम से उपचारित कर लेना चाहिए। 2. कंडुआ रोग - इस रोग के कारण दानों के अंदर काले रंग का चूर्ण भर जाता है तथा दानों का आकार भी बड़ा हो जाता है। इस रोग की रोकथाम के लिए बालियों को काट कर जला देना चाहिए तथा बीज को एग्रोसन जी. एन. (2.5 ग्राम/1 किग्रा बीज) उपचारित करके बोना चाहिए। 3. अरगट रोग - इस रोग से प्रभावित बालियों में दानों के स्थान पर भूरे काले रंग की गांठे दिखाई देने लगती हैं। ये दाने मनुष्यों और पशुओं के लिए हानिकारक होती हैं, क्योंकि इन गांठों में विषैला पदार्थ भरा होता है। इस रोग के उपचार के लिए फसल में फूल आने पर 5-6 दिन के अंदर जिनेब 75% घुलनशील चूर्ण 2 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए तथा बीज को बोने से पूर्व 20% नमक के घोल में भिगो देना चाहिए जिससे रोग की गांठे पानी में ऊपर तैर जाती है तथा शुद्ध बीज नीचे बैठ जाता है। इसी बीज को बोना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण :- बुवाई के तीन से पांच सप्ताह के बाद खुरपी या कसोले से खरपतवार की निराई करे । 👉 अगर मैकेनिकली संभव न हो तो रसायन के प्रयोग से खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है । 👉एट्राजीन (50 डब्लयूपी) का 500 ग्राम (हल्की मिट्टी) और 750 ग्राम (दोमट अथवा भारी मिटी) को 250-300 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ बाजरा बुवाई के दो दिन के अंदर खेतो में छिड़काव करें । इससे चौड़ी व सकरी दोनों तरह की खरपतवार का नियंत्रण होता हैं ।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलटने वाला हल, देशी हल या हैरों खुरपी, फावड़ा, दराँती, इत्यादि यंत्रो की आवश्यकता होती है।