धान(चावल) की खेती

सम्पूर्ण विश्व में पैदा होने वाली प्रमुख फ़सलों में से एक है। प्रमुख खाद्यान्न चावल इसी से प्राप्त होता है। धान भारत सहित एशिया और विश्व के अधिकांश देशों का मुख्य खाद्य है। खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान लगभग पूरे भारत में लगाई जाती है। अगर कुछ बातों का शुरु से ही ध्यान रखा जाए तो धान की फसल ज्यादा मुनाफा देगी। देश के अलग-अलग राज्यों में धान की खेती होती है और जगह मौसम भी अलग होता है, हर जगह के हिसाब से धान की किस्में विकसित की जाती हैं, इसलिए किसानों को अपने प्रदेश के हिसाब से विकसित किस्मों की ही खेती करनी चाहिए।


धान(चावल)

धान(चावल) उगाने वाले क्षेत्र

भारतवर्ष के विभिन्न भागों में धान की खेती प्राचीन काल से होती है। भारत में धान उत्पादक प्रमुख राज्यों में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ ,मध्यप्रदेश, हरियाणा , पंजाब , पश्चिमी बंगाल, असम, उड़ीसा, केरल, तमिलनाडु, तथा आंध्र प्रदेश, तेलगांना आदि हैं। जलवायु :- इस फसल को गर्म और नम जलवायु की आवश्यकता होती है और यह लंबे समय तक धूप और पर्याप्त पानी के साथ क्षेत्र के लिए अनुकूल होता है। चावल के लिए 65 से 75% से अधिक नमी अच्छी होती है। तापमान :- चावल की फसल को औसत 21 से 35 ° C तापमान की आवश्यकता होती है। यह अधिकतम 40 से 42 °C तापमान सहन कर सकता है।

धान(चावल) की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

चावल में लगभग 80% कार्बोहाइड्रेट, 7% प्रोटीन, 3% वसा तथा 1% खनिज लवण पाए जाते हैं।

बोने की विधि

धान की बुवाई के लिए निम्न विधि अपनाई जाती हैं - नर्सरी विधि -1 एकड़ क्षेत्र में रोपाई के लिए, 0.1 एकड़ नर्सरी की आवश्यकता होती है। 1.25 मीटर चौड़ाई 10 सेमी ऊंचाई और उचित लंबाई के साथ ऊँची क्यारियाँ तैयार करें। रोपण से पहले 200 किलो गोबर खाद, 1 किलो यूरिया डालेंं। ट्राइकोडर्मा का एक छिड़काव नर्सरी लगने के 10 दिन के अन्दर कर देना चाहिए। बुवाई के 10-14 दिन बाद एक सुरक्षात्मक छिड़काव रोगों तथा कीटों के बचाव हेतु करें। सीधी बुवाई :- मैदानी क्षेत्रों में सीधी बुवाई की दशा में 90 से 110 दिन में पकने वाली प्रजातियों को चुनना चाहिए। बुवाई मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक समाप्त कर देना चाहिए। धान की सीधी बुवाई में 15 से 17 किलों बीज काम में ले। मैट टाइप नर्सरी उगाना :- धान की नर्सरी उगाने के लिए 5-6 सेमी० गहराई तक की खेत की ऊपरी सतह की मिट्टी एकत्र कर लेते हैं। इसे बारीक कूटकर छलने से छान लेते हैं। जिस क्षेत्र में नर्सरी डालनी है। उसमें अच्छी प्रकार पडलिंग करके पाटा कर दें। तत्पश्चात् खेत का पानी निकाल दें और एक या दो दिन तक ऐसे ही रहने दें जिससे सतह पर पतली पर्तें बन जायें। अब इस क्षेत्र पर एक मीटर चौड़ाई में आवश्यकतानुसार लम्बाई तक लकड़ी की पटि्टयॉ लगाकर मिट्टी की दो से तीन सेमी० ऊँची मेड़ बनायें और इस क्षेत्र में नर्सरी हेतु तैयार की गयी छनी हुई मिट्टी के एक सेमी० ऊँचाई तक बिछाकर समतल कर दें तथा इसके ऊपर अंकुरित बीज 800 से 1000 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से छिड़क दें। अब इसके ऊपर थोड़ी छनी हुई मिट्टी इस प्रकार डालें कि बीज ढ़क जाये। तत्पश्चात् नर्सरी को पुआल घास से ढ़क दें। 4-5 दिन तक पानी का छिड़काव करते रहें नर्सरी में किसी प्रकार के उर्वरक का प्रयोग न करें। धान की रोपाई में पैडी ट्रान्सप्लान्टर का प्रयोग :- पैडी ट्रान्सप्लान्टर छः लाइन वाली हस्तचलित तथा शक्ति चलित आठ लाइन वाली बटन की रोपाई की मशीन है। इस यन्त्र से रोपाई हेतु मैट टाइप नर्सरी की आवश्यकता होती है। इस नर्सरी में धान का अंकुरित बीज उपयोग किया जाता है। इस मशीन द्वारा कतार से कतार की दूरी 20 सेमी० निश्चित है अतः 20-10 सेमी० की दूरी पर रोपाई हेतु 20 किग्रा० प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है। अच्छा अनुकरण 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम पर प्राप्त होता है। धान को पानी में 24 घण्टे भिगोने के पश्चात् छाया में या बोरे में दो या तीन दिन अथवा ठीक से अंकुरण होने तक ढक कर रखना चाहिए। बोरे पर अंकुर निकलने के समय तक पानी छिड़कते रहें। अंकुर फूटने पर बीज नर्सरी में बोने के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई :- 15 दिन की पौध रोपाई करने हेतु स्क्रेपर की सहायता से (20-50 सेमी० के टुकड़ों में) पौध इस प्रकार निकाली जाए ताकि छनी हुई मिट्टी की मोटाई तक का हिस्सा उठकर आये। इन टुकड़ों को पैडी ट्रान्सप्लान्टर की ट्रे में रख दें। मशीन में लगे हत्थे को जमीन की ओर हल्के झटके के साथ दबायें। ऐसा करने से ट्रे में रखी पौध की स्लाइस 6 पिकर काटकर 6 स्थानों पर खेत में लगा दें। फिर हत्थे को अपनी ओर खींच कर पीछे की ओर कदम बढ़ाकर मशीन को उतना खींचे जितना पौध से पौध की (सामान्यतः 10 सेमी०) रखना चाहते हैं। पुनः हत्थे को जमीन की आरे हल्के झटके से दबायें। इस प्रकार की पुनरावृत्ति करते जायें। इससे पौध की रोपाइ्र का कार्य पूर्ण होता जायेगा।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

भूमि की तैयारी :- पहली जुताई मिट्टी पलट हल या 2-3 जुताई हैरो से करके मेड़ बांध कर खेत में पानी भरकर 1 जुताई पैडलर (प्लाऊ) से करें। उसके दूसरे दिन पुनः पैडलर चलाकर पाटा लगा देना चाहिए। धान की बुवाई/रोपाई के लिए एक सप्ताह पूर्व खेत की सिंचाई कर दें, जिससे कि खरपतवार उग आवे, इसके पश्चात् बुवाई/रोपाई के समय खेत में पानी भरकर जुताई कर दें।

बीज की किस्में

धान(चावल) के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

1. पन्त धान 12 - यह किस्म 115 से 120 दिन में पक जाती है। यह किस्म बुन्देलखण्ड को छोडकर उत्तर प्रदेश के सभी मैदानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी उपज 55-60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। 2. जया - 130 से 140 दिन में पकने वाली धान की यह किस्म उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश व पंजाब के लिए बहुत अच्छी है। इसकी उपज 50-60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। 3. यामिनी (C.S.R.-30) - यह बासमती धान की एक अच्छी किस्म है। इसके चावल पतले, लम्बे, मुलायम एचं खुसबूदार होते हैं। इसका औसत कद 150/160 सेमी. होता है, तथा पकने के लिए 155 दिन का समय लेती है। इसकी औसत उपज 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यह प्रजाति क्षारीय मृदा में खेती के लिए अच्छी पाई गई है।

बीज की जानकारी

धान(चावल) की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

छिटकवां विधि से - 100-120 किग्रा, कतारों में बीज बोना- 90 - 100 किग्रा, लेही पद्धति में 70-80 किग्रा, रोपाई पद्धति में- 40-50 किग्रा प्रति हैक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है।

बीज कहाँ से लिया जाये?

धान का बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदें।

उर्वरक की जानकारी

धान(चावल) की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

जहां तक संभव हो उर्वरक की मात्रा भूमि का परीक्षण कराकर ही सुनिश्चित किया जाय तथा गोबर की 4 टन खाद या हरी खाद प्रति एकड़ खेत में डाले। यदि किसी कारणवश मृदा का परीक्षण न हुआ तो उर्वरकों का प्रयोग निम्न प्रकार करें। धान की फ़सल में पोषक तत्वों का अनुपात 2:1:1 में रखते है। उन्नत किस्मों के लिए :- 60:30:30 एनपीके की प्रति एकड़ आवश्यकता होती है। बुवाई के समय यूरिया 66 किलों व सिंगल सुपर फॉस्फेट 188 किलो व 50 किलो म्यूरेट ऑफ़ पोटाश खेत में डाले। बुवाई के 30 दिन बाद यूरिया 33 किलो, बुवाई के 60 दिन बाद यूरिया 33 किलो। संकर किस्मों के लिए :- 80:40:40 एन पी के की प्रति एकड़ आवश्यकता होती है। बुवाई के समय यूरिया 88 किलो व सिंगल सुपर फॉस्फेट 250 किलो व 68 किलो म्यूरेट ऑफ़ पोटाश खेत में डाले। बुवाई के 30 दिन बाद यूरिया 44 किलो, बुवाई के 60 दिन बाद यूरिया 44 किलो। प्रयोग विधि :- रोपाई के सप्ताह बाद आधी नत्रजन तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पूर्व तथा नत्रजन की शेष मात्रा को बराबर-बराबर दो बार में कल्ले फूटते समय तथा बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करें। दाना बनने के बाद उर्वरक का प्रयोग न करें।

जलवायु और सिंचाई

धान(चावल) की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

धान की फसल के लिए जल की बहुत अधिक आवश्कता पड़ती हैं। धान की खेती 1100 एम.एम. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में की जाती है। जब कि खेत को तैयार करने के लिए 200-400 मिमि० जल की माँग होती है। इस फसल में बीजांकुर कल्ले फूटने, फूल आने के समय व दानो में दूध पड़ने के समय सिंचाई की आवश्कता पड़ती हैं। खेत में 5 सेमी० गहरी सिचाई करनी चाहिए। ध्यान रहे कि भूमि में नमी बराबर बनी रहे तथा दाना भरने की अवस्था में 5 सेमी० तक जल स्तर खेत में बनाये रखना लाभदायक होता है।

रोग एवं उपचार

धान(चावल) की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

01 - पत्ती का झुलसा रोग - यह बीमारी जीवाणु के द्वारा होती है। पौधों में यह रोग छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक कभी भी हो सकता है। इस रोग में पत्तियों के किनारे, ऊपरी भाग से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगते हैं। सूखे पीले पत्तों के साथ-साथ राख के रंग जैसे धब्बे भी दिखाई देते हैं। पूरी फसल झुलसी प्रतीत होती है। इसलिए इसे झुलसा रोग कहा गया है। इसके नियंत्रण के लिए नाइट्रोजन की टाॅपड्रेसिंग नहीं करनी चाहिए एवं पानी निकालकर प्रति हैक्टेयर स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 15 ग्राम या 500 ग्राम काॅपर ऑक्सीक्लोराइड जैसे बलाइटॉक्स 50 या फ़्लइटेलॉन का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर 10 - 12 दिन के अंतराल पर 2 - 3 छिड़काव करने चाहिए, जिस खेत में रोग के लक्षण हो उसका पानी दूसरे खेत में नहीं देना चाहिए। 02 - खैरा रोग - यह बीमारी धान (चावल) में जस्ते की कमी के कारण होती है। इसके रोग के प्रकोप से निचली पत्तियां पीली पड़नी शुरू हो जाती हैं और बाद में पत्तियों पर कत्थई रंग के छिटकवा धब्बे उभरने लगते हैं। रोग की तीव्र अवस्था में रोग ग्रसित पत्तियां सूखने लगती हैं, कल्ले कम निकलते हैं तथा पौधों की वृद्धि रूक जाती है। यह रोग फसल में न लगे इसके लिए 25 किग्रा जिंक सल्फेट प्रति हैक्टेयर की दर से रोपाई से पूर्व खेत की तैयारी के समय डालना चाहिए। बीमारी लगने के बाद इसकी रोकथाम के लिए 5 किग्रा. जिंक सल्फेट तथा 2.5 किग्रा चूने का 600 - 700 लीटर पानी में घोल बनाकर एक हैक्टेयर में छिड़काव करें। यदि रोकथाम न हो तो 10 दिन बाद पुनः छिड़काव करें। पौधशाला में खैरा के लक्षण प्रकट होने पर इसी घोल का छिड़काव करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण की रासायनिक विधि :- प्रेटीलाक्लोर 500 मिली बुआई/रोपाई के 2-3 दिन के अन्दर घास कुल के खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग करें। पाइरोजोसल्फयूरॉन 100 ग्राम बुआई/रोपाई के 2-3 दिन के अन्दर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग करें। बिसपायरिबेक सोडियम 40 मिली बुआई/रोपाई के 15-20 दिन के अन्दर घास कुल, मौथा कुल तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग करें। 2,4-डी 500 मिली बुआई/रोपाई के 25-35 दिन के अन्दर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग करें। फिनॉक्साप्रॉकप पी ईथाइल 200 मिली बुआई/रोपाई के 25-35 दिन के अन्दर घास कुल के खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग करें।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल या हैरों, या रूटावेटर, फावड़ा, खुर्पी, ड्रम सीडर, सीड ड्रिलआदि यंत्रों की आवश्कता होती है।