मक्का की खेती

खरीफ फसलों में धान के बाद मक्का प्रदेश की मुख्य फसल है। इसकी खेती, दाने /भुट्टे एवं हरे चारे के लिए की जाती है। धान व गेहूं की तुलना में मक्का की उत्पादकता अधिक होती है। तना मोटा तथा गोल तथा जातियों के अनुसार 4-10 फुट तक लंबा होता है। पौधें में शाखाएं नहीं होती है।


मक्का

मक्का उगाने वाले क्षेत्र

भारत में मक्का मुख्यतः उत्तर भारत में पैदा किया जाता है। ऊपरी गंगा की घाटी, उत्तर पूर्वी पंजाब, दक्षिण-पश्चिम कश्मीर, दक्षिण राजस्थान में यह उगाया जाता है। मक्का उत्पादक मुख्य राज्य आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश आरै हिमाचल प्रदेश हैं। यहाँ मक्का कुल क्षेत्रफल का 95 प्रतिशत पाया जाता हैं। शेष मक्का उड़ीसा और पश्चिम बंगाल मे पैदा होता है। जलवायु और तापमान :- अनिवार्य रूप से एक गर्म मौसम की फसल। लेकिन सभी प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। 20-32 डिग्री  मक्का के फसल की विकास के लिए आदर्श तापमान सीमा है। अंकुरण के लिए आवश्यक तापमान- 20-25 डिग्री है  यह अपने विकास के किसी भी स्तर पर ठंढ का सामना नहीं कर सकता है जो धीमी गति से अंकुरण, खराब विकास, कुछ और छोटी बालियों को प्रभावित करता है और यहां तक ​​कि ठंढ से क्षतिग्रस्त होने पर मर जाता है।

मक्का की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

मक्का में कार्बोहाइड्रेट 71%, प्रोटीन 5%, खनिज लवण 4%, शेष जल पाया जाता है।

बोने की विधि

(i) छिटकाव विधि  - इस विधि से खेत में मक्का का बीज बिखेर कर बोया जाता है इस विधि में मक्का चारे के लिए बोते हैं। (ii) कूंड़ों में - इस विधि में मक्का भुट्टो तथा अन्न के लिए बोई जाती है। इस विधि में दो कूंड़ों के बीच का अंतर लगभग 60 सेमी तथा एक बीज से दूसरे बीज के बीच का अंतर 25 सेमी जिससे एक एकड़ में 30 से 35 हजार पौधे रहे तथा कूँड़ की गहराई 4 से 5 सेमी रखते हैं।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

मक्का की फसल के लिए दोमट, नम व भुरभूरी भूमि का चुनाव करना चाहिए। गोबर की खाद/कम्पोस्ट की मात्रा एवं उपयोग - सामान्यतः 3 से 4 टन प्रति एकड़ की दर से कम्पोस्ट अथवा केंचुआ खाद का प्रयोग बोनी के पूर्व करना चाहिए। उपरोक्त मिश्रण को मिट्टी के ऊपर फैलाएँ और रोटावेटर को पूरे खेत में चलाएँ, जिससे मिट्टी ढेले टूटकर एक समान बोने योग्य बन जाए।

बीज की किस्में

मक्का के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

(i) सूर्या - यह मक्का की नई जाति है जो 75 से 80 दिन में पक जाती है इसकी पैदावार 15 से 17 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। (ii) हाई स्टार्च- यह जाति देश के सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है तथा इसमें स्टार्च बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है इस की फसल में 95 से 110 दिन में पककर तैयार हो जाती है इसकी उपज 22 से 26 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है। इसके दाने सफेद और चपटे होते हैं। (iii) गंगा सफेद 2- यह जाति उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में अच्छी पैदावार देती है। यह 100-110 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी उपज 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है।

बीज की जानकारी

मक्का की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

देशी जातियाँ - 6-8, संकुल जातियाँ- 7-8, संकर - 8-10, चारे के लिए 20-25 किलोग्राम /एकड़।

बीज कहाँ से लिया जाये?

मक्का का बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

मक्का की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

मक्का  की भरपूर उपज लेने के लिए संतुलित  मात्रा में  उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक होता  है। अतः कृषकों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। यदि किसी कारणवश मृदा परीक्षण न हुआ हो तो एनपीके का अनुपात 50:30:20 रखते है। यूरिया - बुवाई के समय 55 किलों प्रति एकड़ और टॉप ड्रेसिंग 25 दिन बाद 27 किलो प्रति एकड़ व 40 दिन बाद फसल में 27 किलो प्रति एकड़ मात्रा का प्रयोग करे। फॉस्फोरस - सम्पूर्ण मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलाएं एसएसपी 188 किलों प्रति एकड़ रखें। पोटास - सम्पूर्ण मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलाएं म्यूरेट ऑफ पोटास 34 किलों प्रति एकड़ रखें। सूक्ष्म तत्वों की उपयोगिता, मात्रा एवं प्रयोग का तरीका :- 10 किग्रा / एकड़ जिंक सल्फेट बोने से पहले छिटकाव  विधी से देना चाहिये।खड़ी फसल में नत्रजन का प्रयोग निंदाई  गुड़ाई   के उपरान्त ही करें।

जलवायु और सिंचाई

मक्का की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

मक्का की फसल में अधिक सिचाई की जरुरत नहीं होती है । जरुरत पड़ने पर फसल की सिचाई करनी चाहिए। मक्का  के पौधों में सिचाई  बाल निकलते समय खेत में नमी बनाए रखना अति आवश्यक है।मक्का के फसल में  उत्तम जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए। क्योकि अधिक जल जमाव से मक्का के पौधे के सूखने की सम्भावना बानी रहती है। 

रोग एवं उपचार

मक्का की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

(i) पत्ती  झुलसा रोग - इस रोग में पत्तियों पर बड़े लम्बे अथवा कुछ अंडाकार भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जिससे रोग के उग्र होने पर पत्तियाँ झुलसकर सूख जाती हैं। (ii) तुलासिता रोग - इस रोग में पत्तियों पर पीली धारियाँ पड़ जाती हैं, पत्तियों के नीचे की सतह पर सफ़ेद रुई के सामान फफूंदी दिखाई देती हैं। ये धब्बे बाद में गहरे अथवा लाल-भूरे पड़ जाते हैं। रोगी पौधे में भुट्टे कम पड़ते हैं या बनते ही नहीं हैं। (iii) तना सडन रोग - यह रोग अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लगता है। इसमें तने की पोरियों पर जलीय धब्बे दिखाई देते हैं, जो शीघ्र ही सड़ने लगते हैं, और उनसे दुर्गन्ध आती है। पत्तियाँ पीली पड़कर सूख जाती हैं। 

खरपतवार नियंत्रण

अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत मक्का की खेती में निराई गुड़ाई का अधिक महत्व है। निराई गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही आक्सीजन का संचार होता है जिससे वह दूर तक फैल कर भोज्य पदार्थ को एकत्र कर पौधों को देती है । पहली निराई जमाव के 15 दिन बाद कर देना चाहिए और दूसरी निराई 35-40 दिन बाद करनी चाहिए। मक्का में खरपतवारों को नष्ट करने के लिए फसल की बुवाई के बाद तथा अंकुरण से पूर्व खेत में टैफाजीन (50% WP) की 800 ग्राम मात्रा को 500 लीटर जल में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव कर देना चाहिए जिससे खरपतवार नहीं उगते। एट्राजीन 800 ग्राम प्रति एकड़ मध्यम से भारी मृदाओं में व 500 ग्राम प्रति एकड़ हल्की मृदओं में बुवाई के तुरन्त 2 दिनों में 200 लीटर/एकड़ पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए। इसके बाद खरी फसल में खरपतवार की समस्या दिखे तो निदाई गुड़ाई करनी चाहिए। 

सहायक मशीनें

देशी हल,कुदाल खुरपी आदि औजारों की आवश्कता पड़ती है।