नींबू की खेती

विश्व में सबसे अधिकतम नींबू की खेती भारत में ही होती है। हल्की एवं मध्यम उपज वाली बलुई दोमट मिट्टी नींबू वर्गीय फलों के लिए उपयुक्त होती है। फल परिपक्व होते समय कम तापमान तथा शुष्क वातावरण में संतरा, मौसम्बी, डोव आदि में अच्छी मिठास विकसित होती है। नींबू की खेती के लिए गर्म एवं माध्यम नमी वाली, पाला और जाड़े की हवा से मुक्त क्षेत्रों को अच्छा माना जाता है। पौधो के रोपण का सबसे सही समय जून से जुलाई तक का होता है एवं उचित सिंचाई के साथ इसकी रोपाई फरवरी और मार्च में भी की जा सकती है। एक बार नींबू का पेड़ लगाने से यह करीबन 20 से 25 सालों तक फल दे सकता है।


नींबू

नींबू उगाने वाले क्षेत्र

भारतवर्ष में काफी बड़े क्षेत्रफल पर नींबू प्रजाति के फलों को उगाया जाता है। यह केरल, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू, कर्नाटक राज्यों में सबसे अधिक उगाई जाती है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ जिले में अधिकतर कागजी नींबू पाया जाता है।

नींबू की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

निम्बू विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। निम्बू का रस अपच एवं कब्ज से संबधित समस्यों का इलाज करने में मदद करता है। इसमें एंटीसेप्टिक गुण भी होते है। हैजा और मलेरिया जैसी बीमारियों का इलाज भी निम्बू से किया जाता है।

बोने की विधि

नींबू का बाग स्थापित करने के लिए पौधा रोपण अच्छी नर्सरी से पौधों को खरीद कर 24-48 घण्टे तक खुले हवादार छाया युक्त स्थान पर रखते हैं क्योंकि पौध रोपण के पहले पौधों की कठोरीकरण करते हैं जिससे पौध रोपण के पश्चात् इनकी मरने की दर कम रहती है। पौध रोपण का उचित समय जुलाई-अगस्त माह हैं। पौध रोपण से पूर्व की जाने वाली मुख्य शस्य क्रियाएँ :- (1) बूंद-बूंद संयत्र व पद्धति की स्थापना । (2) गड्ढ़ों को कीटनाशक दवा जैसे दानेदार फीप्रोनिल 5%SG को प्रत्येक गड्ढों में 5 ग्राम बिखेरना या क्लोरोपाइरीफॉस 20 EC 2 M.L/लीटर का घोल बनाकर भिगोना। (3) अन्त:प्रवाही कवकनाशक कार्बण्डाजिम 50% wp का 2 किलो./गड्ढा पानी में घोल तैयार करके गड्ढ़ों को भिगोया जाना चाहिए। (4) गड्ढ़ों से निकली मिट्टी को दो भागों में विभाजित करते हैं। उपरी मिट्टी एक तरफ तथा निचली मिट्टी को एक तरफ। निम्नलिखित मिश्रण को निचली मिट्टी के भाग के साथ मिलाकर गड्ढों कों पौध रोपण के 15 दिन पूर्व मिलाकर भर देते खाद/उर्वरक मात्रा/गड्ढा गोबर की खाद 25-30 किलो./ गड्ढा नीम की खल 0.5-1.0 किलो./ गड्ढ़ा | जिप्सम चूर्ण 1-2 किलो./गड्ढा ट्राइकोडर्मा संवर्घ उपचारित गोबर 1-2 किलो./गड्ढ़ा सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) एस. एस. पी. 1-2 किलो./गड्ढानोट : ट्राइकोडर्मा कल्चर चूर्ण को नमी युक्त गोबर में सड़ा कर प्रयोग करते हैं। (5) पौधे शाम के समय रस्सी की सहायता से निश्चित दूरी पर रोपित करके 2-3 दिन तक इनकी नियमित हल्की सिंचाई करते रहें।नींबू में फलन की प्रक्रिया व बहार का समय -नींबू के पौधे पर वर्ष में दो बार फूल-फलन आता है। प्रथम फूल फरवरी-मार्च फलन जुलाई तक द्वितीय फूल अगस्त में फलन जनवरी तक राजस्थान की जलवायु व कार्यिकी विकारों का ध्यान रखते हुए किसान को वर्ष में दो बार फलन की अपेक्षा शीत ऋतु के फल का चुनाव करना चाहिए क्योंकि शीत ऋतु वाले फल का आकार, बडा, गुणवत्तायुक्त, अधिक रस वाला होता है एवं बाजार में अच्छी आमदनी होती है।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

नींबू की खेती के लिए अनुकूल मिट्टी कैसी होनी चाहिए -नींबू को हर तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। नींबू की सफल बागवानी के लिए अच्छी जीवांश पदार्थ युक्त बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। जिसका पी. एच. मान 5.5-7.0 के मध्य तथा मृदा विद्युत चालकता 0.50 desi/meter से कम हो वह मृदा उत्तम होती है। साधारणतः फलों के बगीचे के लिए मिट्टी 2 मीटर गहराई तक उपजाऊ होनी आवश्यक है। साथ ही भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।भूमि नींबू के लिए अधिक उपजाऊ दोमट या गहरी बलुई दोमट भूमि सबसे अच्छी मानी जाती है। भूमि से जल-निकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करने के पश्चात 3-4 जुताई हैरों या कल्टीवेटर से करके पाटा लगा देना चाहिए।

बीज की किस्में

नींबू के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

कागजी नींबू, विक्रम, प्रमालिनी, जैदेवी, साई शरबती, चक्रधर, सीडलेस लेमन, बारहमासी, ताहिति लाइम सीडलेस नींबू, ARL -1, ALH-77, PKM-1, Sel 49

बीज की जानकारी

नींबू की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

एक एकड़ में नींबू का बाग स्थापित करने के लिए 15 फिट पर पौधे लगाने के लिए प्रति एकड़  200 पौधे की आवश्यकता होती है।

बीज कहाँ से लिया जाये?

नींबू के पौधे किसी विश्वसनीय स्थान या कृषि विज्ञान केंद्र से खरीद सकते है

उर्वरक की जानकारी

नींबू की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

फलदार वृक्षों में वर्ष में मुख्यतः तीन बार जैविक व रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं। 👉प्रथम वानस्पतिक वृद्धि के समय 👉द्वितीय फूलों के निर्माण के समय 👉तृतीय फलों के विकास के समय खाद व उर्वरक का प्रयोग करते हैं। पौधों में पोषक तत्वों का निर्धारण मृदा की जांच या पत्ती के ऊतक विश्लेषण के आधार पर निर्धारित करते हैं। पत्ती का ऊतक विश्लेषण इससे कम होने पर खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करें। नाइट्रोजन 2.20 - 2.60 प्रतिशत, फॉस्फोरस 0.10 - 0.17 प्रतिशत, पोटेशियम 0.80 - 1.60 प्रतिशत, कैल्शियम 2.60 - 5.50 प्रतिशत, मैग्नीशियम 0.21 - 0.50 प्रतिशत, सल्फर 0.20 - 0.50 प्रतिशत, उपरोक्त विश्लेषण की आवश्यकता पुराने बगीचों में खाद व उर्वरक निर्धारण में मदद करती है। नये बगीचे की स्थापना के बाद मिट्टी के परीक्षण को आधार मानकर खाद व उर्वरक का प्रयोग करें। बगीचों में गोबर की खाद का प्रयोग वर्ष में एक बार पूरी मात्रा को दिसम्बर-जनवरी माह में प्रयोग करते है। रासायनिक उर्वरकों में यूरिया या CAN खाद, सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा पोटेशियम सल्फेट का उपयोग वर्ष में अप्रैल, जुलाई एवं सितम्बर-अक्टूबर महीनों में करते हैं। खाद व उर्वरक तने से 105-120 सेमी. दूरी पर गोल आकार में 10 सेमी. चौड़ी व 30 सेमी गहरी नाली तैयार करके उसमें खाद भरकर मिट्टी को भी साथ में भर देते हैं फिर उसके बाद हल्की सिंचाई करते हैं। साधारण 300-650 ग्रामनत्रजन, 250-400 ग्राम फॉस्फोरस तथा 300-650 ग्राम पौटेशियम मुख्य तत्वों के रूप में प्रति पौध प्रति वर्ष उपयोग में लेवें। जीवांश खाद की सम्पूर्ण मात्रा दिसम्बर-जनवरी में, रासायनिक उर्वरक की कुल मात्रा का प्रथम भाग तथा द्वितीय मार्च-अप्रैल में, जुलाई माह में एवं तृतीय सितम्बर-अक्टूबर में उपयोग करना उचित रहता है। 👉 नींबू की फ़सल सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता की पूर्ति -नींबू के बगीचे में मुख्य पोषक तत्वों के साथ वर्षभर सूक्ष्म मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी उपयोग करते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक, बोरान, मैगनीज, तांबा तथा लोहे का उपयोग करते हैं। इसकी कमी होने पर उत्पादन वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म पोषक तत्व पर्णीय या पेड़ की पत्तियों पर घोल के छिड़काव द्वारा उपयोग करते है। वर्ष में फरवरी व जुलाई माह में ठोस रूप में सूक्ष्म तत्वों के उर्वरकों का मृदा में मिलाकर उपयोग किया जाता हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों का पर्णीय छिड़काव : रसायन मात्रा ग्राम में (प्रति 10 लीटर पानी) जिंक सल्फेट 55 कॉपर सल्फेट 30 मैग्नीशियम सल्फेट 25 फैरस सल्फेट 25 बोरोन 10 चूना (बूझा) 100 यूरिया 100 ठोस रूप में सूक्ष्म तत्वों का उपयोग मृदा में :जिंक सल्फेट 55 ग्राम कॉपर सल्फेट 30 ग्राम मैग्नीशियम सल्फेट 25 ग्राम बोरिक अम्ल 50 ग्राम फैरस सल्फेट 20 ग्राम उपरोक्त मात्रा प्रथम वर्ष में प्रति पौधा उपयोग में लें। 👉 नींबू के बाग़ में जैविक उर्वरकों का प्रयोग :-जैविक उर्वरक पौधों में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण जिब्रेलिन तथा विटामिन्स का संश्लेषण, कार्बनिक अम्लों का उत्पादन करते हैं। ये उर्वरक भूमि में पहले से बिखरे पोषक तत्वों को जैसे N, P, को ठोस माध्यम से तरल माध्यम में परिवर्तित कर पौधों की जड़ों को उपलब्ध करवाते हैं तथा मिट्टी की भौतिक दशा में सुधार करते हैं। नाइट्रोजन तत्व वाले जैविक उर्वरक एजोटोबैकटर, एजोस्पिरिलम फॉस्फोरस तत्व वाले जैविक उर्वरक स्यूडोमोनास, VAM जैविक उर्वरक के उपयोग की विधि व मात्रा : नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए एजोटोबैक्टर या 200 ग्राम 20-25 किग्रा/है. एजोस्पाइरिलम फॉस्फोरस की पूर्ति के लिए स्यूडोमोनास यावाम (VAM) ) मिट्टी में 200 स्पोर/50 ग्राम 25-30 /है। जैविक उर्वरक तरल व चूर्ण माध्यम में बाजार में उपलब्ध हैं। तरल माध्यम वालों को बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति द्वारा सीधे जड़ों में पहुँचाया जाता है। चूर्ण माध्यम वाले उर्वरक को गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर 24-48 घंटे तक रखकर उसे छायादार स्थान पर सड़ाकर पौधों के थॉवलों में मिलाते हैं।

जलवायु और सिंचाई

नींबू की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

नींबू के बगीचों में अच्छे फल व उसकी गुणवत्ता के लिए गर्मी में 10-10 दिन पर तथा शीत ऋतु में 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करने पर अच्छा फल उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति द्वारा 4 ली./ पौधा 1घंटा/दिन वाले ड्रिपर उपयोग में लेते हैं। इस पद्धति द्वारा 2 दिन में एक बार संयत्र को चलाना आवश्यक हैं।नींबू में फूल आने की क्रान्तिक अवस्था पर सिंचाई को एक माह पहले पूर्णतः रोक देनी चाहिए। क्योंकि नींबू के पौधों में सिंचाई करते ही फूलो के गिरने की समस्या रहती है।फूल आने के एक माह पश्चात् नियमित अन्तराल पर पानी देने से फलों में रस की मात्रा बढ़ती है एवं अच्छी गुणवता वाले फल मिलते हैं। चूंकि नींबू में फल व फलन वर्ष में दो बार होने के कारण सिंचाई का समुचित प्रबंधन आवश्यक हैं। वर्षा ऋतु में थांवलों में अधिक पानी भरने की स्थिति में जल निकास की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

रोग एवं उपचार

नींबू की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

माहू- मुलायम शाखाओं पर आने वाली पत्तियों तथा टहनियों का मुड़ना इसके प्रमुख लक्षण है|नियंत्रण-  इमीडाक्लोप्रिड 17.8 % SL  0.5 ML  प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फरवरी, अगस्त व अक्टूबर के महीनों में छिड़काव करें|लीफ माइनर- नींबू की पत्तियों पर सफेद रंग की सर्प की आकृति की रेखाओं का बनना लीफ माइनर के प्रमुख लक्षण है|नियंत्रण- प्रभावित पत्तियों को तोड़कर जला दें और  इमीडाक्लोप्रिड 17.8 % SL  0.5 ML  प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर या सक्सेस 0.5 से 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर मार्च, अप्रैल व जुलाई से अगस्त में छिड़काव करें|कैंकर- नींबू की शाखाओं, पत्तियों व फलों पर भूरे रंग के धब्बे बनना व धीरे-धीरे शाखाओं का मरना इस रोग के लक्षण है|नियंत्रण- प्रभावित भागों को काटकर जलायें तथा 0.1 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन + 0.05 ग्राम कापर सल्फेट का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फरवरी, अक्टूबर व दिसम्बर में छिड़काव करें|

खरपतवार नियंत्रण

नींबू के बाग की निराई गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण अवांछित पौधे जो बगीचे में पौधों के थांवलों में स्वतः ही उग आते हैं ये खरपतवार कहलाते हैं। ये पौधे नये बगीचों में पोषक तत्व अवशोषित कर फलदार पौधों की वृद्धि में प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। खरपतवार उन्मूलन के लिए निम्न क्रियाएँ अपनाएँ: 1. नये बगीचे में मार्च से जून माह तक पलवार का प्रयोग करें। 2. छोटे पौधों में 15 दिन के अंतराल पर हल्की निराई गुड़ाई करते रहें। 3. पंक्तियों के बीच खाली जगह पर एक माह के अंतराल पर रोटोवेटर या हैरो चलाकर खरपतवार रहित बगीचे को रखना चाहिए। 4. पुराने बगीचों के थांवले में खरपतवारनाशी का प्रयोग किया जा सकता है जैसे खरपतवार उगने के पूर्व सिमाजिन 6-8 किग्रा./हैक्टेयर, एट्राजिन 3-4 किग्रा. /हैक्टेयर तथा खरपतवार उगने के बाद ग्लाईफोसेट 5 किग्रा./हैक्टेयर । उपरोक्त दवा को 800-1000 लीटर पानी में मिलाकर थॉवलों में चारों ओर हवा स्थिर हों तब छिड़काव करें। खरपतवार रहित खेत या बगीचा होने पर रस चूषक कीट का प्रकोप कम होता हैं। इस कारण कम समय में ही पौधों की अच्छी वृद्धि दिखाई देती है।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, हैरों, खुर्पी, फावड़ा आदि यन्त्रों की आवश्यकता होती है।