भिंडी की खेती

भिन्डी फल वाली एक महत्वपूर्ण सब्जी है जिसे देश के लगभग सभी भागों में उगाया जाता है। इसकी सब्जी बहुत ही लोकप्रिय तथा प्रसिद्ध है। भिंडी के पौधों को पीटकर, पानी में मसलकर इसका लसदार रस गन्ने के रस की निखरी (सफाई) में प्रयोग किया जाता है, जिससे गुड़-शक्कर के रंग में सुधार आ जाता है। इसके अतिरक्त इसका उपयोग कैनिंग तथा फ्रोजन करके भी किया जाता है।


भिंडी

भिंडी उगाने वाले क्षेत्र

भारत में लगभग सभी राज्यों में भिंडी की खेती की जाती है। प्रमुख उत्पादक राज्यों में उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब और असम प्रमुख राज्य है। भिण्डी हरियाणा की बहुत ही महत्वपूर्ण सब्जियों में से एक है। जलवायु व तापमान :- भिंडी एक गर्म मौसम की फ़सल है। इसकी सफल खेती के लिए 25 से 30 डिग्री सेन्टीग्रेट का तापमान उपयुक्त होता है। बीजों का जमाव 15 डिग्री पर अच्छा होता है। ज्यादा तापमान होने पर फूल झडने लगते हैं।

भिंडी की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

ओक्रा के स्वास्थ्य लाभ में पाचन स्वास्थ्य और दृष्टि में सुधार, त्वचा की स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, कैंसर को रोकने और हड्डियों को मजबूत करने की क्षमता शामिल है। यह हृदय स्वास्थ्य को बेहतर रखने में भी लाभदायक है, कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित करता है।

बोने की विधि

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए पंक्तियों और पौधों में क्रमश: 30 सेमी और 35 सेमी दूरी रखनी चाहिए।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

भिंडी को विभिन्न प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है किन्तु जीवांश प्रदार्थ युक्त, उचित जल निकास वाली दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम रहती है। 6 से 6.8 पी.एच. वाली भूमि भिंडी की खेती के लिए उपयुक्त रहती है। 4 क़्वींटल गली सडी गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से खेत की तैयारी के समय मिला देना चाहिए। पहले जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें इसके उपरांत 2 से 3 बार हैरो चलायें।

बीज की किस्में

भिंडी के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

पूसा मखमली - इस किस्म के फल चिकने व हरे रंग के होते हैं। यह किस्म पूसा सावनी से अधिक पैदावार देती है, किन्तु इसमें मौजेक नामक रोग अधिक लगता है जिसके कारण इसकी कम पैदावार मिलती है। परभानी क्रान्ति भिन्डी मध्यम लम्बी तथा मुलायम होती है। इस किस्म की भिन्डी की क्वालिटी अच्छी होती है। ये किस्म 120 दिन में 40 से 70 क्विंटल प्रति एकड़ की औसत पैदावार देती है। पंजाब पद्मिनी - इस किस्म की भिंडी गहरे हरे रंग की बालो वाली लम्बे समय तक फ्रेश रहती है। बिजाई के 55 से 60 दिन बाद तैयार हो जाती है। येलो मोज़ेक वेन वायरस के प्रतिरोधी किस्म है। अर्का अनामिका भिन्डी की ये किस्म IIHR बंगलोर द्वारा रिलीज़ की गई है। इस किस्म पर फल दो बार में आते है। पहली बार बिजाई के 45 से 50 दिन बाद मुख्य तने पर लगती है तथा दूसरी बार मुख्य तने से निकली टहनियों पर भी लगती है। भिन्डी अच्छी क्वालिटी की होती है। येलो मोज़ेक वायरस के प्रतिरोधी है तथा 90क्विंटल प्रति एकड़ की पैदावार 130 दिन में देती है। पूसा सावनी - भारत के विभिन्न भागों में सफलतापूर्वक उगाई जा रही है। इसे ग्रीष्म और वर्षाकालीन फसल के रूप में भी उगाया जा सकता है। सलेक्शन 1 - इस किस्म के पौधे पूसा सावनी की अपेक्षा कुछ छोटे और फैलावदार होते हैं, फलों में रोएँ पूसा सावनी नामक किस्म से अधिक होते हैं। प्रति एकड़ उपज 45से 70 क्विंटल तक मिल जाती है। सलेक्शन 2 - इस किस्म के फल पूसा सावनी की तुलना में पतले, लंबे और गहरे हरे रंग के होते हैं। प्रति पौधा फलों की संख्या पूसा सावनी नामक किस्म से अच्छी होती है। यह पीत शिरा मौजेक नामक रोग की प्रतिरोधी किस्म है। पंजाब - इस किस्म का विकास पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है। यह किस्म पीले विषाणु मौजेक रोगरोधी किस्म है। इसकी फलियां हरी, लंबी, कोमल और पंचकोणीय होती है। इस किस्म की उपज पंजाब पद्मिनी नामक किस्म की अपेक्षा 40% अधिक और पूसा सावनी किस्म की अपेक्षा 80% अधिक प्राप्त होती है। इस किस्म की उपज प्रति एकड़ 70 क्विंटल तक मिल जाती है। अर्का अभय (Arka Abhay) अर्का उपहार (Arka Uphar) पी०-7 (P7) आई. आई. वी. आर.-10 (IIVR 10) Hybrid Avantika, Hyb-016, तुलसी Arka Nitika F1 hybrid - ये किस्म 43 दिन लेती है फल देने में तथा 210 से 240 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की पैदावार देती है। इस किस्म का समय 125 से 130 दिन तक है।

बीज की जानकारी

भिंडी की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

बीज दर :- ग्रीष्मकालीन फसल जनवरी से मार्च में 8-10 किलो बीज प्रति एकड़ बोयें। वर्षाकालीन फसल जून से जुलाई में टहनियों वाली किस्मों के लिए 4-6 किलो बीज प्रति एकड़, 60 x 30 सैं.मी. दूरी पर बोयें। बिना टहनियों वाली किस्मों के लिए 45 x 30 सैं.मी. की दूरी रखें। बीजोपचार :- बुवाई से पहले बीज को 24 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रखने से बीज का जमाव अच्छा होता है। मृदा जनित बीमारियों के लिए बीजों को कार्बेनडाज़िम 50 % डब्लूपी  से उपचार करें। उपचार करने के लिए बीजों को 2 ग्राम कार्बेनडाज़िम  50 % डब्लूपी घोल प्रति लीटर पानी में मिलाकर 6 घंटे के लिए डुबो दें और फिर छांव में सुखाएं। फिर तुरंत बुवाई कर दें। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए और मिट्टी में पैदा होने वाली कीट से बचाने के लिए बीजों को इमीडाक्लोप्रिड  5 ग्राम प्रति किलो बीज से और बाद में ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें।

बीज कहाँ से लिया जाये?

भिंडी के बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदें। भिण्डी की प्रथम बार फलियां बनने के प्रत्येक 2-3 दिन बाद फलियों की तुड़ाई करें। देरी से उनकी तुड़ाई करने से वे कठोर हो जाती हैं। फल तोड़ने के लिए सर्वोत्तम समय फूल खिलने के 6-7 दिन बाद होता है। लेकिन फलियों की तुड़ाई उनकी जातियों पर निर्भर करती हैं।

उर्वरक की जानकारी

भिंडी की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

भिंडी की अच्छी व गुणवत्तायुक्त फसल लेने के लिए भूमि में पोषक तत्वों की उचित मात्रा होनी चाहिए। उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण के परिणाम के आधार पर तय किया जाना चाहिए। भिंडी मे उचित पोषण प्रबंधन के लिए कम्पोस्ट खाद के साथ सिफारिश की गयी। उर्वरकों का अनुपात एनपीके 100:50:50 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें। नत्रजन :- 110 किलो यूरिया प्रति एकड़बुवाई के समय खेत में मिलाएं और 55 किलो यूरिया रोपाई के 30 से 35 दिन बाद और 55 किलो यूरिया 45 से 50 दिन बादखड़ी फ़सल में डालें। फॉस्फोरस :- 312 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। पोटाश :- 85 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (mop) प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। घुलनशील पोषक तत्व :- रोपाई के 10-15 दिन बाद 19:19:19 के साथ सूक्ष्म तत्वों 2.5-3 ग्राम प्रति लीटर में मिलाकर स्प्रे करें। बुवाई के 35 दिनों में फूल और पैदावार बढ़ाने के लिए जीए-3 1 मिली प्रति 1 लीटर पानी का छिड़काव करें।

जलवायु और सिंचाई

भिंडी की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

ग्रीष्मकालीन भिंडी के लिए निरंतर सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके लिए प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए वर्षाकालीन पर फसल की सिंचाई वर्षा के ऊपर निर्भर करती है।

रोग एवं उपचार

भिंडी की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

येलो बेन मौजिक (Yellow Vein Mosaic) - यह भिंडी का सबसे भयंकर रोग है। यह रोग विषाणु द्वारा फैलता है। पत्तियां और फल पीले पड़ जाते हैं। फल छोटे बेडौल और कठोर हो जाते हैं। रोकथाम - (i) रोगी पौधों को उखाड़ कर जला दें। (ii) फसल पर 0.15% मेलाथियान का छिड़काव करें। (iii) फसल को खरपतवार से मुक्त रखें। (iv) रोग प्रतिरोधी जातियां, जैसे -पूसा सावनी, आई. एच. आर. 20-31 उगायें।मेटासिस्टाक्स 36 % ई.सी. 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर 10-15 दिन के अन्तर पर तीन बार छिडकाव करना चाहिए। चूर्णीय फफूंदी (powdery Mildew) - यह रोग ऐरीसाईफ सिनचोरा सीरम नामक फफूंदी द्वारा होता है। पत्तियों की निचली सतह में सफेद चूर्ण जैसा पदार्थ जमा रहता है। पत्तियां गीली होकर गिरने लगती हैं। रोकथाम - 10 किग्रा प्रति एकड़ की दर से गंधक के चूर्ण का छिड़काव करें। प्ररोह एवं फल छेदक :- इस कीट का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक होता है। प्रारंभिक अवस्था में इल्ली कोमल तने में छेद करती है जिससे तना सूख जाता है। फूलों पर इसके आक्रमण से फल लगने के पूर्व फूल गिर जाते है। फल लगने पर इल्ली छेदकर उनको खाती है जिससे फल मुड जाते हैं एवं खाने योग्य नहीं रहते है। रोकथाम हेतु क्विनॉलफॉस 25 प्रतिशत ई.सी., क्लोरपाइरोफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. अथवा प्रोफेनफॉस 50 प्रतिशत ई.सी. की 2.5 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी के मान से छिडकाव करें तथा आवश्यकतानुसार छिडकाव को दोहराएं। रेड स्पाइडर माइट :- यह माइट पौधे की पत्तियों की निचली सतह पर भारी संख्या में कॉलोनी बनाकर रहता है। यह अपने मुखांग से पत्तियों की कोशिकाओं में छिद्र करता है। इसके फलस्वरुप जो द्रव्य निकलता है उसे माइट चूसता है। क्षतिग्रस्त पत्तियां पीली पडकर टेढ़ी मेढ़ी हो जाती है। अधिक प्रकोप होने पर संपूर्ण पौधे सूख कर नष्ट हो जाता है। रोकथाम हेतु डाइकोफॉल 18.5 ई.सी. की 2.0 मिली मात्रा प्रति लीटर अथवा घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आवश्यकतानुसार छिडकाव को दोहराए।

खरपतवार नियंत्रण

खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। ग्रीष्मकालीन और वर्षाकालीन फसल के लिए क्रमश: 3-4 व 2-3 निराइयां पर्याप्त होती हैं। वर्षाकालीन फसल में मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए मेटाक्लोर 50 ई.सी. की 1 लीटर या स्टाम्प की 1.5 लीटर मात्रा 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से बुवाई के 48 घण्टे के अन्दर छिड़काव करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल, या हैरों, खुर्पी, कुदाल, फावड़ा, आदि यंत्रों की आवश्यकता होती है।