मूंगफली की खेती

मूंगफली भारत की मुख्य महत्वपूर्ण फसल है। ऊष्ण कटिबंधीय पौधा होने के कारण इसे लंबे समय तक गर्म मौसम की आवश्यकता होती है। अंकुरण और प्रारंभिक वृद्धि के लिए 14-15°C तापमान का होना आवश्यक है।


मूंगफली

मूंगफली उगाने वाले क्षेत्र

मूंगफली की खेती गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडू, कर्नाटक तथा राजस्थान आदि राज्यों में की जाती है। जलवायु और तापमान :- गर्म और नम परिस्थितियाँ बहुत अनुकूल होती हैं। ठंडी और बरसाती जलवायु के परिणामस्वरूप, अंकुरण और पौधों की बढ़वार धीमी हो जाती हैं, जिससे बीजों का सड़ना और पौधों में रोगों का खतरा बढ़ जाता है। तेजी से अंकुरण होने के लिए और अंकुरित पौधों के विकास के लिए उचित तापमान लगभग 28°C होता है। 34°C से ऊपर का तापमान मूंगफली के विकास को रोकता है। बुवाई के समय कम तापमान अंकुरन में देरी करता है और साथ ही बीज और पौधों के बीमारियों को बढ़ाता है। परिपक्वता के दौरान पौधों को लगभग एक महीने की गर्म और शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है।

मूंगफली की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

इसमें स्वाद के साथ-साथ कई प्रकार के स्वास्थ्य को लाभ पंहुचाने संबंधी गुण भी होते हैं, जैसे की आयरन, नियासिन, फोलेट, कैल्शियम और जिंक। इन सब खूबियों से यह वनस्पतिक प्रोटीन का एक अच्छा और सस्ता स्रोत है।

बोने की विधि

समतल भूमि में मूँगफली को छिटककर बो दिया जाता है। यह एक अवैज्ञानिक विधि है। इसमें पौध संख्या अपर्याप्त रहती है साथ ही फसल की निराई-गुड़ाई करने में कठिनाई होती है। उपज भी बहुत कम प्राप्त होती है। मूँगफली की बुवाई के लिए प्रायः निम्न विधियाँ प्रयोग में लाई जानी चाहिए- (i) हल के पीछे कूड़ों में बुवाई - देशी हल के पीछे से बीज की बुवाई कूड़ों में 5-7 सेमी. गहराई पर की जाती है। (ii) डिबलर विधि - यह विधि थोड़े क्षेत्रफल में बुवाई करने के लिए उपयुक्त है। पंक्तियों में खुरपी की सहायता से छिद्र बना लेते हैं जिनमें बीज डालकर मिट्टी से ढँक देते हैं। इसमें बीज की मात्रा कम लगती है। इसमें श्रम एंव व्यय अधिक लगता है। (iii) सीड प्लांटर द्वारा - इस यन्त्र से बुवाई अधिक क्षेत्रफल में कम समय में हो जाती है। बीज को बोने के बाद पाटा चलाकर बीज को ढँक दिया जाता है। भूमि का प्रकार एंव नमी की मात्रा के अनुसार बीज की गहराई 5-7 सेमी. के बीच रखनी चाहिए। इस विधि से श्रम एंव व्यय की बचत होती है।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

मूंगफली की खेती के लिये अच्छे जल निकास वाली, भुरभुरी दोमट व बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करने के बाद, 3-4 जुताई देशी हल, या हैरों या कल्टीवेटर से करने के बाद आखिरी बार खेत को जोतने के समय गोबर की खाद 5 टन प्रति एकड़ मिट्टी में मिलाएं पाटा लगा देना चाहिए। भूमि उपचार :- भूमिगत कीटों एवं दीमक की रोकथाम के लिये बुवाई से पूर्व भूमि उपचार करना आवश्यक है। जहां सफेद लट का विशेष प्रकोप हो वहां सफेद लट की रोकथाम हेतु की गई सिफारिश अपनानी चाहिये। दीमक का नियंत्रण उन्हीं कीटनाशकों से हो जायेगा। जिन क्षेत्रों में केवल दीमक का प्रकोप है वहां दीमक की रोकथाम हेतु क्यूनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 10 किलो प्रति एकड़ की दर से भूमि में बुवाई से पूर्व मिलाना चाहिये। दीमक का प्रकोप कम करने के लिये खेत की पूरी सफाई जैसे सूखे डंठल आदि इकट्ठे कर हटा देना, कच्चा खाद का प्रयोग न करना आदि काफी सहायक होते हैं। सफ़ेद लट नियंत्रण - खरीफ की अधिकांश फसलों में सफेद लट का प्रकोप होता है। इसकी प्रौढ़ अवस्था (बीटल) व लट दोनों नुकसान करती हैं। प्रौढ़ कीट (भृंग नियंत्रण) मानसून या इससे पूर्व की भारी वर्षा एवं कुछ क्षेत्रों के खेतों में पानी लगने पर जमीन से भृंग का निकलना शुरू हो जाता है। भृंग रात के समय जमीन से निकलकर परपोषी वृक्षों पर बैठते हैं। परपोषी वृक्ष अधिकतर खेजड़ी, बेर, नीम, अमरूद एवं आम आदि है। भृंगो का निकलना 4 से 5 दिन तक चालू रहता है। सफेद लट से प्रभावित क्षेत्रों में परपोषी वृक्षों पर, भृंग रात में विश्राम करते है। ऐसे वृक्षों को रात में छांट लेवें और दूसरे दिन मोनोक्रोटोफॉस 36 एस. एल. 25 मिली लीटर या क्यूनॉलफास 25 ई.सी. 36 मिली लीटर प्रति 15 लीटर पानी में घोल कर इन्हीं वृक्षों पर छिड़काव करें। भुंग निकलने के तीन दिन बाद अंडे देना शुरू होता है इसलिये तुरन्त छिड़काव लाभदायक है। जहां वयस्क भृंग को परपोषी वृक्षों से रात में पकड़ने की सुविधा हो वहां भृंगो के निकलने के बाद करीब 9 बजे रात्रि को बांसों की सहायता से परपोषी वृक्षों पर बैठे भृंगो को हिलाकर नीचे गिराये एवं एकत्रित कर मिट्टी के तेल मिले पानी में डालकर (एक भाग मिट्टी का तेल एवं 20 भाग पानी) नष्ट करें। लटों वाली अवस्था में नियंत्रण क्यूनालफॉस 5 प्रतिशत कण या कारबोफ्यूरॉन 3 प्रतिशत कण या सेवीमोल 4 प्रतिशत कण 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से काम में लेवें । खड़ी फसल में सफेद लट नियंत्रण के लिये चार लीटर क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ देना चाहिये। यह उपचार मानसून की वर्षा के 21 दिन के आसपास/भृगों की भारी संख्या के साथ ही खड़ी फसल में करें। मित्र फफूंद द्वारा दीमक नियंत्रण -10 किलो मित्र फंफूद बावेरिया बेसियाना या मेटारिजियम एनिसोपली पाउडर को प्रति हैक्टेयर की दर से 125 किलो गोबर की खाद में कल्चर करके बुवाई पूर्व खेत में डालें।

बीज की किस्में

मूंगफली के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

उन्नत किस्में :- मूंगफली की तीन अलग-अलग प्रजातियां होती हैं। हल्की मिट्टी के लिये फैलने वाली और भारी मिट्टी के लिये झुमका किस्म के पौधों वाली जातियां है, जो भूमि के अनुसार बोने के काम में ली जाती है। कम फैलने वाली या फैलने वाली प्रजाति के पौधों की शाखाएं फैल जाती हैं तथा मूंगफली दूर-दूर लगती है। जबकि झुमका प्रजाति की फलियां मुख्य जड़ के पास लगती है और इनका दाना गुलाबी या लाल रंग का होता है। इसकी पैदावार फैलने वाली प्रजाति से कम आती है, परन्तु ये जल्दी पकती है। उपयुक्त किस्मों की विशेषताओं का विवरण निम्न प्रकार है। एच एन जी 10 :- यह अर्द्ध विस्तारी किस्म, अच्छी वर्षा या जहां जीवन रक्षक सिंचाई जल उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी पत्तियां गहरी हरी तथा पौधे मध्यम फैलाव वाले होते हैं। यह किस्म 125-130 दिन में पक कर लगभग 10 क्विण्टल प्रति एकड़ उपज देती है। इसकी फली में औसतन दो दाने होते हैं। 100 दानों का वजन 45 ग्राम के लगभग होता है तथा इनमें तेल की मात्रा 50-51 प्रतिशत होती है। टी जी 37 ए :- यह एक गुच्छेदार, मध्यम ऊँचाई तथा सीधी बढ़ने वाली किस्म है जो 120-125 दिन में पक कर लगभग 10 क्विण्टल प्रति एकड़ उपज देती है। इसके दाने गुलाबी रंग के होते हैं तथा 100 दानों का वजन 48 ग्राम होता है। इनमें 48 प्रतिशत तेल तथा 23 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा होती है। जी जी 20 :- यह एक अर्द्ध विस्तारी किस्म है जो 115 से 120 दिन में पक जाती है इसकी फली में सामान्यतयः 2 से 3 दाने होते हैं। 100 दानों का वजन 42 ग्राम के लगभग तथा दानों में 48 प्रतिशत तेल होता है। इसकी औसतन उपज 12 से 14 क्विण्टल /एकड़ होती है। टी जी 39 :- इस गुच्छे वाली किस्म को भाभा अणु अनुसंधान केन्द्र, मुंबई तथा राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर ने संयुक्त रूप से विकसित किया। इसके दाने बड़े होते हैं तथा यह किस्म लगभग 115-120 दिन में पक जाती है। इसमें तना गलन तथा पिलिया रोग भी कम होते है। इसकी औसत उपज 12-15 क्विण्टल प्रति एकड़ होती है। गिरनार-2 :- मूंगफली अनुसंधान निदेशालय जूनागढ़ (गुजरात) द्वारा विकसित यह किस्म मुख्यतः खरीफ मौसम के लिये उपयुक्त है। इस किस्म के दाने बड़े आकार के तथा सौ दानों का भार लगभग 62 ग्राम होता है। इसकी औसत उपज 14 क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है। इसके दानों में तेल की मात्रा 51 प्रतिशत बतायी गई है। यह किस्म रतुआ रोग के प्रति सहिष्णु बतायी गई है। एच.एन.जी. 123 :- कृषि अनुसंधान उप केन्द्र हनुमानगढ़ द्वारा विकसित यह किस्म गुच्छानुमा प्रकार की है। इस किस्म की औसत उपज 15 क्विंटल प्रति एकड़ तथा दानों में तेल की मात्रा 49 प्रतिशत तक बतायी गई है। आर.जी. 425 :- राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान दुर्गापुरा द्वारा विकसित यह किस्म विशेषतः राजस्थान राज्य के लिये खरीफ के मौसम के लिये निस्तारित की गई है। इस किस्म की औसत उपज 12-16 क्विंटल प्रति एकड़ तथा दानों में तेल की मात्रा 48 प्रतिशत पायी जाती है। यह किस्म सूखे के प्रति व कॉलर गलन रोग के प्रति प्रतिरोधी बतायी गई है। आर जी 510 :- वर्जिनियां एक प्रकार की यह किस्म विस्तारी वर्ग की है। इसके दाने मोटे व 100 दानो का वजन लगभग 65-68 ग्राम होता है इसकी औसत 14 से 15 क्विंटल प्रति एकड़ है। यह किस्म कोलर रोट, स्टेम रोट, लीफ स्पॉट आदि रोगों के प्रति प्रतिरोधी है। तथा थ्रिप्स, जैसिड व ग्रासहॉपर जैसे कीड़ों के प्रति सहिष्णु भी है। चन्द्रा, टी.बी.जी.- 39, एम-13 व मल्लिका।

बीज की जानकारी

मूंगफली की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

बीज दर :- 50-55 किग्रा बीज की प्रति एकड़ आवश्यकता होती है। बीजोपचार :- फफूंदनाशी से उपचार - इनमें से कोई एक चयन करें - क्लोरोथोनिल 75%WP (फंगीसाइड) ईशान (टाटा) 2 gm/kg बीज, क्लोरोथोनिल 75% WP(फंगीसाइड) जटायु (कोरोमंडल) 2gm/kg बीज, ट्राइकोडर्मा विरिडी (बायो फंगिसाइड) UPL 8 gm/kg बीज, कार्बेण्डाजिम 12% + मैन्कोजेब 63% (फंगीसाइड) साफ़(UPL) 2gm/kg बीज, कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत + टीएम टीडी 37.5 प्रतिशत 3 ग्राम प्रति किलो बीज कीटनाशी से उपचार - इनमें से कोई एक चयन करें - सफेद लट और दीमक की रोकथाम के लिये क्लोथियिड 50%WP (कीटनाशक) दंतोत्सु (सुमोटोमो) 2.5 gm/kg बीज, इमिडाक्लोरोपिड 70% WS (कीटनाशक) गावचु (बायर) 7 gm/kg बीज, थाओमेथोक्साम 70% WS स्लेयर (जीएसपी) 2 gm/kg बीज, क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. या क्यूनॉलफॉस 25 ई.सी.4-5 मिली / किलो बीज। दीमक की रोकथाम के लिए जैविक मित्र फफूँद बावेरिया बासियाना या मेटारीजियम एनिसोपली (कोई एक) से 10 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। फंफूदनाशी, कीटनाशी और राईजोबियम कल्चर से बीजोपचार उपर्युक्त क्रम में ही करें ।

बीज कहाँ से लिया जाये?

मूंगफली का बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

मूंगफली की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

मूंगफली की अच्छी व गुणवत्ता युक्त फसल लेने के लिए भूमि में पोषक तत्वों की उचित मात्रा होनी चाहिए। उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण के परिणाम के आधार पर तय किया जाना चाहिए। मूंगफली मे उचित पोषण प्रबंधन के लिए कम्पोस्ट खाद के साथ सिफारिश की गयी। उर्वरकों का अनुपात एनपीके 10:20:10 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें। नत्रजन :- 10 किलो यूरिया प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं और 12 किलो यूरिया बुवाई के 30 से 35 दिन बाद खड़ी फ़सल में डालें। फॉस्फोरस :- 125 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। पोटाश :- 20 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (mop) प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। जड़ों के अच्छे विकास के लिए पोटाश की जरूरत होती है। जिप्सम :- 80 किलो बुवाई के समय और खड़ी फ़सल में बुवाई के 45 दिन बाद 80 जिप्सम खेत में डालें।

जलवायु और सिंचाई

मूंगफली की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

मूंगफली खरीफ फसल होने के कारण इसमें सिंचाई की प्रायः आवश्यकता नहीं पड़ती है, यदि वर्षा, समय पर न हो तब आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए।

रोग एवं उपचार

मूंगफली की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

(i) मूंगफली का पर्ण चित्ती अथवा टिक्का रोग - सर्वप्रथम रोग के लक्षण पत्तियों की ऊपरी सतह पर हल्के धब्बे के रुप में दिखाई देते हैं, और पत्ती की निचली बाह्य त्वचा की कोषिकायें समाप्त होने लगती हैं। ये धब्बे गोलाकार से अनियमित आकार के एवं इनके चारों ओर पीला परिवेष होता है। आरंभ में यह पीले घेरे द्वारा घिरे होते है तथा इन धब्बों की निचली सतह का रंग काला होता है। रोगग्रसित पौधों से फलियां बहुत कम और छोटी प्राप्त होती हैं। इस रोग के नियंत्रण हेतु बीजों को थायरम या कैप्टान द्वारा उपचारित करके बोना चाहिये एवं मूंगफली की फसल के साथ ज्वार या बाजरा की अंतवर्ती फसलें उगानी चाहिए, जिससे प्रकोप को कम किया जा सके। फसल पर कार्बेन्डाजिम 0.1% या मेनकोजेब 0.2% छिड़काव करना चाहिए। (ii) जड़ सड़न रोग - इस रोग के प्रभाव से पौधे पीले पड़ने लगते है, मिट्टी की सतह से लगे पौधे के तने का भाग सूखने लगता है। जड़ों के पास मकड़ी के जाले जैसी सफेद रचना दिखाई पड़ती है। प्रभावित फलियों में दाने सिकुड़े हुये या पूरी तरह से सड़ जाते हैं, फलियों के छिलके भी सड़ जाते है। इस रोग के नियंत्रण हेतु बीज को उपचारित करके बोना चाहिए तथा ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करनी चाहिए। लम्बी अवधि वाले फसल चक्र अपनायें। बीज को फफूंदनाषक दवा थायरम या कार्बेन्डाजिम से 3 ग्राम दवा प्रति किग्रा बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

मूंगफली की बुवाई के लगभग 15-20 दिन बाद पहली निड़ाई-गुड़ाई तथा 30-35 दिन के बाद दुसरी निड़ाई-गुड़ाई करनी चाहिए।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल, हैरों, खुर्पी, कुदाल, फावड़ा, आदि यंत्रों की आवश्यकता होती है।