मूंग की खेती

मूंग एक दलहनी फसल है। मूंग ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। इस जिन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 60 सेंटीमीटर से 90 सेंटीमीटर तक होती है वहां यह सफलतापूर्वक उगाई जाती है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ो में गांठेपाई जाती है जो कि वायुमण्डलीय नत्रजन का मृदा में स्थिरीकरण (15-20 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति एकड़ ) एवं फसल की खेत से कटाई उपरांत जड़ो एवं पत्तियो के रूप में प्रति एकड़ 1 टन जैविक पदार्थ भूमि में छोड़ा जाता है जिससे भूमि में जैविक कार्बन का अनुरक्षण होता है एवंमृदा की उर्वराशक्ति बढाती है।


मूंग

मूंग उगाने वाले क्षेत्र

भारतवर्ष में इसकी खेती उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार,आंध्र प्रदेश,राजस्थान, हरियाणा,गुजरात,आदि प्रदेशों में की जाती है। जलवायु :-यह गरम जलवायु और सूखे की परिस्थिति के प्रति सहनशील है। हरी मूंग सभी दालों में सबसे अधिक सहिष्णु दलहनी फसल है। अच्छी वृद्धि के लिए इसे गरम जलवायु की आवश्यकता होती है। इसे शुष्क मौसम पसंद है। अत्यधिक बारिश की वजह से इसकी वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है जिसके कारण फलियाँ लगना और विकास कम हो जाता है। इसे 20℃ से 40℃ के तापमान में उगाया जा सकता है और इसका अनुकूलतम तापमान 28 से 30 है। यदि पुष्पन के समय भारी बारिश हो तो इसकी उत्पादन पर विपरीत असर हो सकता है।

मूंग की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

कार्बोहाइड्रेट - 62.62 g शर्करा - 6.60 g आहारीय रेशा - 16.3 g वसा - 1.15 g प्रोटीन -23.86 g विटामिन C - 4.8 mg 8% कैल्शियम - 132 mg 13% मैगनीशियम - 189 mg 51% फॉस्फोरस - 367 mg 52% पोटेशियम - 1246 mg 27% सोडियम - 15 mg 1%

बोने की विधि

वर्षा के मौसम में इन फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने हेतु हल के पीछे पंक्तियों अथवा कतारों में बुआई करना उपयुक्त रहता है। खरीफ फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 30-45 से.मी. तथा बसंत (ग्रीष्म) के लिये 20-22.5 से.मी. रखी जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से.मी. रखते हुये 4 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

इसकी फसल के लिए दोमट तथा बलुई-दोमट भूमि उत्तम मानी जाती है इसके लिए भूमि से जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।खेत तैयारी करते समय खेत में 1.5 से 2 टन गोबर की खाद बुवाई के 1 माह पूर्व जुताई के समय देनी चाहिए जिससे वह मिट्टी में मिल कर अच्छी प्रकार सड़ जाए।उपरोक्त मिश्रण को मिट्टी के ऊपर फैलाएँ और रोटावेटर को पूरे खेत में चलाएँ, जिससे मिट्टी एक महीने में बोने योग्य बन जाए।

बीज की किस्में

मूंग के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

(i) मोहिनी - यह जाति खरीफ की फसल में उगाई जाती है। यह 75 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उपज लगभग 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। (ii) पन्त मूंग 1 - यह प्रजाति कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर में विकसित की गई है। इसको जायद और खरीफ की फसलों में उगाया जाता है। यह जायद की फसल में 60-65 दिन में, तथा खरीफ की फसल में 70 से 75 दिन में पककर तैयार हो जाती है इसकी उपज लगभग 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है इसमें पीला मौजेक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है। (iii) पन्त मूंग 2 - मूंग की यह जाति कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर में विकसित हुई है। यह जायद और खरीफ की फसलों में उगाई जाती है। यह जायद की फसल में 65 दिन, तथा खरीफ में 75 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। इसमें पीला मौजेक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है। (iv) एम. एल.5 - इसकी फसल खरीफ में उगाई जाती है। यह 90 दिन में पक जाती है। इसकी उपज 10 से 12 क्विंटल/हैक्टेयर होती है। इसमें पीली चित्ती रोग की प्रतिरोधक क्षमता होती है। (v) टाइप 1 - इस मूंग की जायद प्रथा खरीफ की फसल में उगाया जाता है। इसके दाने चमकीले तथा हरे रंग के होते हैं। इसकी फसल 60 से 62 दिन में पककर तैयार की जाती है। इसकी उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

बीज की जानकारी

मूंग की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

खरीफ की फसल के लिए 6-8 किग्रा/एकड़ तथा जायद की फसल में 8से 10 किग्रा/एकड़ बीज की मात्रा पर्याप्त होती है

बीज कहाँ से लिया जाये?

मूँग के बीज किसी विश्वसनीय स्थान से खरीदना चाहिए! 

उर्वरक की जानकारी

मूंग की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

उर्वरकों का संतुलित मात्रा :- मूंग की भरपूर उपज लेने के लिए संतुलित उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। अतः कृषकों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। यदि किसी कारण वंश मृदा परीक्षण न हुआ हो तो एनपीके 8:16:24 का अनुपात प्रति एकड़ रखते है। फसल की पंक्ति से 5 सेमी गहराई पर देनी चाहिए। यूरिया - बुवाई के समय 9 किलो प्रति एकड़ फॉस्फोरस- सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय 100 सिंगल सुपर फॉस्फेटका प्रति एकड़ प्रयोग करें। पोटास - 40 किलों म्यूरेट ऑफ पोटास सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय खेत में डालें।

जलवायु और सिंचाई

मूंग की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

सिंचाई एंव जल निकास :- प्रायः वर्षा ऋतु में मूंग की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पडती है फिर भी इस मौसम में एक वर्षा के बाद दूसरी वर्षा होने के बीच लम्बा अन्तराल होने पर अथवा नमी की कमी होने पर फलियाँ बनते समय एक हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। बसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में 10-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल पकने के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिये। वर्षा के मौसम में अधिक वर्षा होने पर अथवा खेत में पानी का भराव होने पर फालतू पानी को खेत से निकालते रहना चाहिये, जिससे मृदा में वायु संचार बना रहता है।

रोग एवं उपचार

मूंग की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

(i) पीली चित्ती रोग - इस रोग से प्रभावित पौधे में पहले पत्तियों पर गोल पीले धब्बे बनते हैं जिसके बाद में पूरी पत्ती पीली पड़कर सूख जाती है। यह एक वाइरस रोग है जो सफेद मक्खी द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे पर फैलता है। इस रोग के उपचार हेतु मेटासिस्टाक्स के 0.1% के घोल से फसल पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए। (ii) चारकोल विगलन - यह रोग फफूंदी द्वारा उत्पन्न होता है। इसमें पौधे की जड़े तथा तना सड़ जाता है। फलियों पर गहरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। इस रोग से उपचार के लिए बीज को ब्रेसीकाल 0.25% से उपचारित करके बोना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

फसल व खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की क्रान्तिक अवस्था मूंग में प्रथम 30 से 35 दिनों तक रहती है। इसलिये प्रथम निदाई-गुडाई 15-20 दिनों पर तथा द्वितीय 35-40 दिन पर करना चाहियें। घासकुल एवं कुछ चैडी पत्ती वाले खरपतवार के लिए पेन्डिमिथिलीन 700 मिली प्रति एकड़ बुवाई के तुरंत बाद 0-3 दिन तक छिड़काव कर सकते है। घासकुल, मोथाकुल एवं चैडी पत्ती वाले खरपतवार के लिए इमेजेथापायर 200 मिली प्रति एकड़ बुवाई के 20 दिन बाद खड़ी फसल में छिड़काव करें। घासकुल के खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण के लिए क्यूजालोफाप ईथाइल (टरगासुपर) 400 मिली प्रति एकड़ बुवाई के 15-20 दिन बाद खड़ी फ़सल में छिड़काव करें।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल, या हैरों, फावड़ा, खुर्पी, हंसिया आदि यंत्रो की आवश्यकता होती है।