कपास की खेती

कपास की खेती का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्व है। कपास के धागे से सूती वस्त्र बनाए जाते हैं तथा आजकल टेरीकाट आदि कपड़ों में भी सूती धागों का मिश्रण किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसके बिनौले से वनस्पति घी बनाया जाता है। तथा बिनौले की खली पशुओं को खिलाने के काम आती है।


कपास

कपास उगाने वाले क्षेत्र

भारत में कपास की खेती पंजाब, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है। जलवायु और तापमान की आवश्यकता :- कपास को ऐसी जगहों पर उगाया जा सकता है, जहाँ कम से कम 180-200 ठंढ मुक्त दिन उपलब्ध हैं। उच्च आर्द्रता से कपास की सड़न होती है। उच्च प्रकाश की तीव्रता के कारण कपास का रंग आसमानी हो जाता है। गूलरों के फटने हेतु चमकीली धूप व पाला रहित ऋतु आवश्यक है। 20-30C तापमान कपास का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए अनुकूल रहता है। तापमान 18C से कम होने पर अंकुरण में देरी होती हैं। मिट्टी में पर्याप्त नमी के तहत कपास छोटी अवधि के लिए 43-45C से उच्च तापमान का सामना कर सकता है।

कपास की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

साबुत बिनौला में उच्च प्रोटीन (23%), वसा के रूप में उच्च ऊर्जा (20%), और सूखे पदार्थ के आधार पर कच्चे फाइबर (24%) होते हैं। अन्य सामान्य रूप से उपलब्ध प्रोटीन सप्लीमेंट्स की तुलना में, अतिरिक्त उच्च ऊर्जा और उच्च फाइबर दोनों के साथ साबुत बिनौला ही एकमात्र है।

बोने की विधि

बुवाई और दुरी :-सामान्यत: कपास की बुवाई हल के पीछे कूंड़ों में की जाती है। 👉ट्रैक्टर द्वारा बुवाई करने पर कतार से कतार की दूरी 67.5 सेमी. व पौध से पौध की दूरी 30 सेमी. तथा देशी हल से बुवाई करने पर कतारों के मध्य की दूरी 70 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी. हो। 👉भूमि में जहां जलस्तर ऊँचा हो या लवणीय मिट्टी/पानी हो या जलभराव की समस्या हो वहां मेड़ों पर बुवाई करना उपयोगी है। 👉इसके लिए 20-25 सेमी. ऊंची मेड़े बनाकर नीचे से दो तिहाई भाग पर निश्चित दूरी पर खुर्पी द्वारा मेड़ों पर बुवाई करें। बुवाई हेतु प्रतिस्थान केवल 4-5 बीज ही प्रयोग करें।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

कपास की फसल के लिए दोमट मिट्टी उत्तम समझी जाती है। वैसे कपास की फसल काली मिट्टी जलोढ़ मिट्टी तथा लाल मिट्टी आदि में भी उगाई जाती हैं।कपास की खेती के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की गहरी जुताई करके फिर 2-3 जुताई देशी हल तथा कल्टीवेटर से कर देनी चाहिए।खेत में 4 से 5 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ खेत तैयार करते समय डालनी चाहिए। जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए। तथा नमी संरक्षित करने के लिए पाटा लगा देना चाहिए।

बीज की किस्में

कपास के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

किसानो द्वारा दी गई प्रतिक्रिया पर आधारित है इसके अलावा कुछ जानकारी कंपनी द्वारा प्रोडक्ट के बारे में दिए गए विवरण से ली गई है। अपने विवेक से काम ले क्यूंकि अच्छे बीज के अलावा अन्य कारक जैसे मिटटी, जलवायु, बुवाई का समय, पोषक तत्व आदि बातें भी महतवपूर्ण होती है । 👉 RCH 773 :- Rasi seeds कंपनी की इस वैरायटी को किसानो की अच्छी प्रतिक्रिया मिली है । इसका पौधा अच्छी ऊंचाई का तथा विगरस होता है । ये वैरायटी लीफ कर्ल वायरस के प्रति सहनशील है । रस चूसने वाले किटो के प्रति भी सहनशील है । बॉल बड़ी होती है । ये किस्म मध्यम भारी जमीन के लिए उपयुक्त है । 👉 RCH 776 :- Rasi seeds की इस किस्म (cotton variety) की बिजाई पिछले वर्ष काफी एरिया में किसानो द्वारा बोई गई तथा अच्छी प्रतिक्रिया मिली । इस किस्म पर फल श्रृंखला में आते है तथा कपास के बड़े गोले (बॉल) लगते है । रस चूसने वाले किटो के प्रति भी सहनशील है । बॉल पौधे पर बनी रहती है ।ये किस्म हल्की मध्यम जमीन के लिए उपयुक्त है । 👉 US 51 :- US agriseeds की ये किस्म (cotton Variety) काफी अच्छी है जो किसानो के बीच बहुत पसंद की गई ।ये किस्म पंजाब हरियाणा तथा राजस्थान के लिए उपयुक्त है । ये कपास की मध्यम परिपक्वता वाली हाइब्रिड किस्म है । रस चुसक किटो के प्रति सहनशील है ।उपज काफी अच्छी देती है । बॉल बड़े आकार की होती है ।इसकी चुगाई / कटाई आसान है । 👉 US 71 :- US 51 के बाद US agriseeds की इस किस्म (cotton Variety) ने भी कपास का काफी एरिया अपने नाम किया ।ये किस्म पंजाब हरियाणा तथा राजस्थान के लिए उपयुक्त है । ये कपास की मध्यम परिपक्वता वाली हाइब्रिड किस्म है । रस चुसक किटो के प्रति सहनशील है । उपज काफी अच्छी देती है । बॉल बड़े आकार की होती है ।इसकी चुगाई / कटाई आसान है । 👉 Surpass 7172 BGII :- ये बायर क्रॉप साइंस कंपनी की किस्म ( cotton variety) है । किस राज्य के लिए उपयुक्त उत्तर भारत राज्य जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान समय कपास की सरपास किस्म 162 से 170 दिन का समय लेती है । ज्यादा पैदावार की क्षमता है ।कपास अच्छी खिलती है तथा चुगाई आसान है । सफ़ेद मक्खी तथा लीफ कर्ल वायरस के प्रति सहनशील है ।गेहूं कपास फसल चक्र के लिए ये किस्म अच्छी है । 👉 Surpass 7272 BGII :-किस राज्य के लिए उपयुक्त ये मध्यम अवधि की किस्म (cotton variety) उतरी भारत के राज्य जैसे हरियाणा, पंजाब व् राजस्थान के लिए उपयुक्त है । समय ये 162 से 170 दिन की वैरायटी है ।पैदावार ज्यादा देती है । खुला और सीधी बढ़ने वाली किस्म है और इसकी बॉल बड़ी होती है । सफ़ेद मक्खी तथा लीफ कर्ल वायरस के सहनशील है । 👉 Money Maker :- ये कावेरी सीड्स कंपनी की वैरायटी (cotton variety) है । इसकी बॉल बड़ी होती है । ये वैरायटी काफी अच्छी पैदावार देती है । 👉 Ajeet-199 BGII :- ये किस्म 140 से 150 दिन लेती है । पौधे की ऊंचाई 150 से 160 cm होती है । कपास के गोले (बॉल) का वजन 6 से 6.5 ग्राम होता है । ये किस्म कम पानी वाली जगह के लिए अच्छी है । पत्ते लाल होने की समस्या कम होती है । ये रस चुसक किटो और बीमारियों के प्रति सहनशील है । रेशे की क्वालिटी अच्छी होती है । 👉 Shriram 6588 :- ये मध्यम अवधि की किस्म (cotton variety) है । ये किस्म 165 से 170 दिन का समय लेती है ।बॉल का वजन 5 से 5.5 ग्राम होता है । अच्छी पैदावार देने वाली किस्म है ।मध्यम भारी जमीन के लिए उपयुक्त किस्म है । BCHH 6488 BG II :-यह एक हाइब्रिड किस्म है, जिसके पत्ते हरे, तंग, उंगलियों के आकार और फूल क्रीम रंग के होते हैं। यह किस्म 165-170 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पिंजाई के बाद 34.5 प्रतिशत तक रूई प्राप्त होती है और रेशे की लंबाई 27 मि.मी. होती है पर इस किस्म पर पत्ता मरोड़ बीमारी और सूखा रोग के हमले का खतरा ज्यादा होता है। BCHH 6588 BG II :-यह किस्म किसानों में बहुत प्रसिद्ध है।इसके अलावा अजीत 55, ATM, JK8940, RCH 650 काफी अच्छी किस्मे है ।जी.-27, लोहित एफ-320, प्रमुख, संकर-6, संकर-10, सुजाता, कीर्ति, संगम, सुविन तथा पूसा अगेती।

बीज की जानकारी

कपास की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

देसी कपास- 4 से 5 किलोग्राम प्रति एकड़। अमेरिकन कपास- 5 से 7 किलोग्राम प्रति एकड़। हायब्रिड कपास -1.25 किलोग्राम बीज प्रति एकड़। बीज उपचार :-बीज सुखाने के बाद कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशक द्वारा 2.5 ग्राम प्रति किग्रा. की दर वइमिडाक्लोप्रिड- 4 मिलीकिग्रा. की दर से बीज शोधन करना चाहिए। 👉फफूंदनाशक दवाई के उपचार से राइजोक्टोनिया जड़ गलन फ्यूजेरियम उकठा और अन्य भूमि जनित फफूंद से होने वाली व्याधियों को बचाया जा सकता है। 👉कार्बेन्डाजिम अन्तप्रवाही (सिस्टेमिक) रसायन है। जिससे प्राथमिक अवस्था में रोगों के आक्रमण से बचाया जा सकता है।

बीज कहाँ से लिया जाये?

कपास के बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

कपास की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

कपास की अच्छी व गुणवत्तायुक्त फसल लेने के लिए भूमि में पोषक तत्वों की उचित मात्रा होनी चाहिए। उर्वरकों की मात्रा को मृदा परीक्षण के परिणाम के आधार पर तय किया जाना चाहिए।कपास मे उचित पोषण प्रबंधन के लिए कम्पोस्ट खाद के साथ सिफारिश की गयी।उर्वरकों का अनुपात देशी व अमेरिकन किस्मों के लिए एनपीके 24:12:12 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें। देशी व अमेरिकन किस्मों के लिए :- विकल्प 1 - 👉यूरिया - 26 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय और बुवाई के 30 दिन बाद 13 किलो यूरिया और बुवाई 45 दिन बाद 13 किलो यूरिया खाद प्रति एकड़ टॉप ड्रेसिंग के दें। 👉 एसएसपी - 75 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं । 👉 म्यूरेट ऑफ पोटास - 20 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं । विकल्प 2 - 👉 यूरिया - 16 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय और बुवाई के 30 दिन बाद 13 किलो यूरिया और बुवाई 45 दिन बाद 13 किलो यूरिया खाद प्रति एकड़टॉप ड्रेसिंग के दें। 👉 डीएपी 27 किलोप्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं । 👉 म्यूरेट ऑफ पोटास - 20 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं । हाइब्रिड किस्मों के लिए :- उर्वरकोंका अनुपात एनपीके 40:20:20 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें। 👉 यूरिया - 44 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय और बुवाई के 30 दिन बाद 22 किलो यूरिया और बुवाई 45 दिन बाद 22किलो यूरिया खाद प्रति एकड़टॉप ड्रेसिंग के दें। 👉 एसएसपी - 125 किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं । 👉 म्यूरेट ऑफ पोटास - 34किलो प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं । घुलनशील खादें :-यदि बिजाई के 80-100 दिनों के बाद फसल को फूल ना निकलें या फूल कम हों तो फूलों की पैदावार बढ़ाने के लिए ज्यादा सूक्ष्म तत्व खाद 750 ग्राम प्रति एकड़ प्रति 150 लीटर पानी की स्प्रे करें। बी.टी किस्मों की पैदावार बढ़ाने के लिए बिजाई के 85, 95 और 105 दिनों के बाद 13:0:45 के अनुसार 10 ग्राम या पोटाश 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे शाम के समय करें।अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए पोटाश्यिम 10 ग्राम प्रति लीटर और डी.ए.पी. 20 ग्राम प्रति लीटर (पहले फूल खिलने के प्रत्येक 15 दिनों के फासले पर 2-3 स्प्रे) की स्प्रे करें। कई बार वर्गाकार लार्वा गिरता है और इससे फूल झड़ने शुरू हो जाते हैं, इसकी रोकथाम के लिए पलैनोफिक्स (एन ए ए) 4 मि.ली. और ज्यादा सूक्ष्म तत्व 120 ग्राम, मैगनीश्यिम सल्फेट 150 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी की स्प्रे करें। यदि खराब मौसम के कारण टिंडे झड़ते दिखाई दें तो इसकी रोकथाम के लिए 100 ग्राम 00:52:34+30 मि.ली. हयूमिक एसिड (12 प्रतिशत से कम)+ 6 मि.मी. स्टिकर को 15 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों की फसलों पर तीन स्प्रे करें। आज कल पत्तों में लाली बहुत ज्यादा दिख रही है, इसका मुख्य कारण पौष्टिक तत्वों की कमी है। इसे खादों के सही उपयोग से ठीक किया जा सकता है। इस तरह करने के लिए 1 किलो मैगनीश्यिम सल्फेट की पत्तियों पर स्प्रे करें और इसके बाद यूरिया 2 किलो को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

जलवायु और सिंचाई

कपास की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

सिंचाई और जलनिकास :-कपास की उपज पर सिंचाई एवं जल निकास का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। पहली सिंचाई बुवाई के 30-35 दिन बाद करनी चाहिए। यदि वर्षा न हो तो 2-3 सप्ताह के अंतर से सिंचाई की आवश्यकता होती है।इस बात का विशेष ध्यान रखे कि फूल व गूलर बनते समय पानी की कमी कदापि न हो अन्यथा कलियां फूलों व गूलरों का अत्यधिक झरण होगा।यदि दोपहर में पौधों की पत्तियां मुरझाने लगे तो सिंचाई कर देनी चाहिए। मध्य सितम्बर में भी कभी-कभी पानी की आवश्यकता पड़ती है। इस समय सिंचाई करने से गूलर शीघ्र फटते हैं।सिंचाई करते समय सावधानी रखनी चाहिए कि पानी हल्का लगाया जावे और पौधों के पास न रूके। फसल बढ़वार के समय वर्षा का पानी खेत में प्रायः रूक जाने से वायु संचार रूक जाता है पौधे पीले पड़कर मर जाते है। अतः इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पौधे के पास रूकने वाले पानी को यथाशीघ्र निकाल दें। खेत में जल निकास हेतु एक मुख्य नाली का भी होना आवश्यक है।

रोग एवं उपचार

कपास की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

आल्टरनेरिया पत्तों के धब्बे :- इससे पत्तों पर छोटे, पीले से भूरे, गोलाकार या बेढंगे मोटे मोटे धारियों वाले धब्बे पड़ जाते हैं। प्रभावित पत्ते सूखकर झड़ने शुरू हो जाते हैं। जिससे टिंडे गलने लग जाते हैं और झड़ जाते हैं। पौष्टिक तत्वों की कमी और सूखे से प्रभावित पौधों पर इस बीमारी का ज्यादा हमला होता है।इस बीमारी की रोकथाम के लिए टैबुकोनाज़ोल 1 मि.ली. या ट्राइफलोकसीट्रोबिन+ टैबुकोनाज़ोल 0.6 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे बिजाई के 60 वें, 90 वें, और 120 वें दिन बाद करें। यदि बीमारी खेत में दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कप्तान 500 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें या कार्बेनडाज़िम 12 प्रतिशत + मैनकोज़ेब 63 प्रतिशत डब्लयू पी 25 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 👉 पत्तों पर धब्बा रोग :-इससे पत्तों पर गोलाकार लाल धब्बे पड़ जाते हैं, जो कि बाद में बड़े होकर बीच में से सफेद और सलेटी रंग के हो जाते हैं। यह धब्बे गोल होते हैं और बीच बीच में लाल धारियां होती हैं। धब्बों के बीच में सलेटी रंग के गहरे दाने बन जाते हैं, जिस कारण वह सलेटी रंग के दिखाई देते हैं।यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो फसल पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 %WP 3 ग्राम या मैनकोजेब  75 % WP 2.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिनों के फासले पर 3-4 बार स्प्रे करें। 👉 एंथ्राकनोस :-इस बीमारी से पत्तों पर छोटे, लाल या हल्के रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। तनों पर जख्म बन जाते हैं। जिससे पौधा कमज़ोर हो जाता है। यह बीमारी टिंडों पर कभी भी हमला कर सकती है और बाद में यह बीमारी रूई और टिंडे के अंदर वाले बीज पर नुकसान करती है। इस बीमारी से प्रभावित टिंडों पर छोटे, पानी जैसे, गोलाकार, लाल - भूरे धब्बे पड़ जाते हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बिजाई से पहले प्रति किलो बीजों को कप्तान या कार्बेनडाज़िम 3-4 ग्राम से उपचार करें। खेत में पानी खड़ा ना होने दें। यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो प्रभावित पौधों को जड़ों से उखाड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। फिर कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी को स्प्रे करें। 👉 जड़ गलन :-इससे पौधा अचानक और पूरा सूख जाता है। पत्तों का रंग पीला पड़ जाता है। प्रभावित पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सकता है। मुख्य जड़ के अलावा कुछ अन्य जड़ें ताजी होती हैं जो कि पौधे की जकड़ बनाए रखती हैं और बाकी की जड़ें गल जाती हैं। बिजाई से पहले मिट्टी में नीम केक 60 किलो प्रति एकड़ में डालें। जड़ गलने के हमले की संभावना कम करने के लिए ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो प्रभावित पौधों और साथ के सेहतमंद पौधों के नीचे की ओर कार्बेनडाज़िम 50 % WP 1 ग्राम प्रति लीटर डालें। 👉 अमेरिकन सुंडी :-यह सुंडी पत्ते के ऊपरी और निचली ओर अंडे देती है। अंडे में से निकली सुंडी का रंग शुरू में पीला सफेद होता है, इसका सिर भूरा काला होता है। बाद में इसके शरीर का रंग गहरा हो जाता है और उसके बाद इसका रंग भूरे रंग में तबदील हो जाता है। इस सुंडी के हमले से टिंडों में गोल छेद हो जाते हैं। इन छेदों के बाहरी ओर सुंडी का मल दिखाई देता है। अकेला लार्वा 30-40 टिंडों को नुकसान पहुंचा सकता है। इन हमलों की जांच के लिए रोशनी वाले कार्डों या फेरोमोन कार्ड का प्रयोग करें।कपास की फसल लगातार एक खेत में ना लगाएं, बल्कि बदल बदल कर फसल उगाएं। कीड़ों का हमला रोकने के लिए हरी मूंग, काले मांह, सोयाबीन, अरिंड, बाजरा आदि को कपास की फसल के साथ या उसके आस पास लगाना फायदेमंद रहता है। कपास बोने से पहले, पहली फसल के बचे कुचे को अच्छी तरह निकाल दें। पानी का सही मात्रा में प्रयोग करें और नाइट्रोजन खाद का ज्यादा प्रयोग ना करें।इसकी रोकथाम के लिए रोधक किस्में उगाएं अमेरिकन सुंडी की रोकथाम के लिए कुदरती ढंग ना अपनाएं। यदि हमला ज्यादा हो तो उपलब्धता अनुसार साइपरमैथरिन या डैल्टामैथरिन या फैनवेलरेट या लैंबडा साइहैलोथ्रिन में से किसी एक को 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित फसल पर स्प्रे करें। टिंडे की सुंडी की उचित रोकथाम के लिए एक ग्रुप के कीटनाशक की स्प्रे एक बार ही करें। 👉 गुलाबी सुंडी :-लार्वे का रंग शुरू में सफेद होता है और बाद में इसका रंग काले, भूरे या हरे से पीला या गुलाबी हो जाता है। बड़ी सुंडियों की गतिविधियां जानने के लिए फेरोमोन कार्ड का ही प्रयोग करें। यदि इसका हमला नज़र आये तो फसल पर कार्बरिल 5 प्रतिशत डी 10 किलो को प्रति एकड़ के हिसाब से बुरकाओ। यदि हमला ज्यादा हो तो ट्राइज़ोफॉस 40 ई सी 300 मि.ली. प्रति एकड़ की स्प्रे करें। 👉 तंबाकू सुंडी :-यह सुंडियां झुंड में हमला करती हैं और यह मुख्य तौर पर पत्ते की ऊपरी सतह को अपना शिकार बनाती हैं और पत्ते खाकर इसकी नाड़ियां छोड़ देती हैं। यदि इसका हमला ज्यादा हो तो बूटे का तना और टहनियां ही दिखाई देती हैं। हरी सुंडी के अंडे सुनहरी भूरे रंग के होते हैं और यह इकट्ठे दिखाई देते हैं। इसका लार्वा हरे रंग का होता है।इन कीड़ों के हमले की तीव्रता जानने के लिए रोशनी कार्डों का प्रयोग करें। एक एकड़ में 5 सैक्स फेरोमोन ट्रैप लगाएं इन कीड़ों की हाथों से भी जांच करें। इनका लार्वा झुंड में मिलता है, उसे इक्ट्ठा करके जल्दी ही नष्ट कर दें। यदि इनका हमला बहुत ज्यादा हो तो क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 1 लीटर या क्लोरैंटरानीलीपरोल 18.5 प्रतिशत एस सी 50 मि.ली. या डाइफलूबैंज़ियूरॉन 25 प्रतिशत डब्लयू पी 100-150 ग्राम की स्प्रे प्रति एकड़ में करें। कीटनाशकों की स्प्रे सुबह या शाम के समय ही करनी चाहिए। 👉 तेला :-नए जन्मे और बड़े तेले पत्तों के निचली ओर से रस चूस लेते हैं, जिससे पत्ता मुड़ जाता है। इसके बाद पत्ते लाल या भूरे हो जाते हैं और फिर सूखकर गिर पड़ते हैं। जड़ों के नजदीक कार्बोफियूरन 3 जी 14 किलो या फोरेट 10 जी 5 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से नमी वाली मिट्टी में डालें। जब फसल का उपरला हिस्सा पीला पड़ने लगे और पौधे के 50 प्रतिशत तक पत्ते मुड़ जायें तो कीटनाशक की स्प्रे करें। इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 40-50 मि.ली. या थाइमैथोक्सम 40 ग्राम या एसेटामीप्रिड 75 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 👉 धब्बेदार सुंडी :-इसकी सुंडी या लार्वा हल्के हरे काले चमकदार रंग का होता है और शरीर पर काले रंग की धारियां होती हैं। सुंडी के हमले के कारण फूल निकलने से पहले ही टहनियां सूख जाती हैं और फिर झड़ जाती हैं। यह टिंडों में छेद कर देती हैं और फिर टिंडे गल जाते हैं।यदि इसका हमला दिखे तो रोकथाम के लिए प्रोफैनोफॉस 50 ई सी 500 मि.ली. को प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।👉 मिली बग :-यह पत्तियों के निचली ओर झुंड में पाया जाता है और यह चिपचिपा पदार्थ छोड़ता है। चिपचिपे पदार्थ के कारण पत्तों पर फंगस बनती है, जिससे पौधे बीमार पड़ जाते हैं और काले रंग के दिखाई देते हैं।इसकी रोकथाम के लिए मक्की, बाजरा और जवार की फसलें कपास की फसल के आस पास उगाएं। प्रभावित पौधों को उखाड़कर पानी के स्त्रोतों या खाली स्थानों पर ना फेंके, बल्कि इन्हें जला दें। कपास के खेतों के आस पास गाजर घास ना होने दें, क्योंकि इससे मिली बग के हमले का खतरा बढ़ जाता है। इसे नए क्षेत्रों में फैलने से रोकने के लिए प्रभावित क्षेत्रों वाले इन्सानों या जानवरों को सेहतमंद क्षेत्रों में जाने से रोक लगाएं। शुरूआती समय नीम के बीजों का अर्क 5 प्रतिशत 50 मि.ली. + कपड़े धोने वाले सर्फ 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित पौधों पर डालें। यदि इसका हमला गंभीर हो तो प्रोफैनोफोस 500 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। एक चम्मच वॉशिंग पाउडर 15 लीटर की टैंकी में मिक्स करें या क्विनलफॉस 25 ई सी 5 मि.ली. या क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 3 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।

खरपतवार नियंत्रण

   कपास की अच्छी उपज लेने हेतु पूरी तरह खरपतवार नियंत्रण होना अति आवश्यक है। इसके लिए तीन-चार बार फसल बढ़वार के समय गुड़ाई ट्रैक्टर चालित कल्टीवेटर या बैल चालित त्रिफाली कल्टीवेटर द्वारा करनी चाहिए। पहली गुड़ाई सूखी हो जिसे पहली सिंचाई के पूर्व (बुवाई के 30-35 दिन पहले) ही कर लेनी चाहिए। फूल व गूलर बनने पर कल्टीवेटर का प्रयोग न किया जाये । इन अवस्थाओं में खुर्पी द्वारा खरपतवार निकाल देना चाहिए। रसायनिक नियंत्रण :- पेंडीमेथलीन  30 % EC 600 मिली प्रति एकड़ जमाव से पूर्व या बुवाई के में 2-3 दिन के अन्दर प्रयोग करें। बुवाई के 30 दिन बाद - ऑक्सिफ्लूरोफेन 200 मिली/एकड़ याक्वीझालोफोप इथील 400 मिली/एकड़।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल या हैरों, फावड़ा, खुर्पी, आदि यंत्रों की आवश्यकता होती है।