फूल गोभी की खेती

भारत में करीब तीन हज़ार हेक्टेयर में फूल गोभी की खेती की जाती है, जिससे तकरीबन 6,85,000 टन उत्पादन होता है। उत्तर प्रदेश तथा अन्य ठन्डे स्थानों में इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। लेकिन अब इसे सभी स्थानों पर उगाया जाता है।


फूल गोभी

फूल गोभी उगाने वाले क्षेत्र

विश्व में चीन गोभी उत्पादन में प्रथम स्थान पर है, भारत द्वितीय एवं स्पेन तृतीय है। भारत में प. बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, हरयाणा, असम, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश मुख्या उत्पादक राज्य हैं। जलवायु और तापमान :-इसकी सफल खेती के लिए ठंडी तथा आर्द्र जलवायु सर्वोत्तम होती है| अधिक ठंडा और पाले का प्रकोप होने से फूलों को अधिक नुकसान होता है| शाकीय वृद्धि के समय तापमान अनुकूल से कम रहने पर फूलों का आकार छोटा हो जाता है| अच्छी फसल के लिए 15 से 20 डिग्री तापमान सर्वोत्तम होता है|

फूल गोभी की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

फूलगोभी ह्रदय के लिए अच्छी होती है, इससे कोलेस्ट्रॉल घटाने में मदद मिलती है। यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढाती है।

बोने की विधि

नर्सरी की तैयारी :- फसल उगाने के लिए एक एकड़ क्षेत्र में 100 मि.स्क्वे. नर्सरी क्षेत्र पर्याप्त है। 3 मी. लंबी, 0.6 मी. चौड़ाई और 10-15 सेंमी ऊंचाई वाली क्यारियाँ तैयार करें। दो क्यारियों में 60 सेमी की दूरी रखें। क्यारियों में पंक्तियों के बीच 1-2 सेमी गहराई और 10 सेमी दुरी रख कर बीज बोएं और मिट्टी की बारीक परत से ढँक दें, इसके बाद कैन द्वारा थोडा पानी दें। आवश्यक तापमान और नमी बनाए रखने के लिए क्यारियों को सूखी घाससे ढँक देना चाहिए। जब तक अंकुरण नहीं हो जाता है, तब तक आवश्यकता अनुसार कैन से पानी देना चाहिए। प्रत्यारोपण के दस दिन पहले ही अंकुरित पौधों को मजबूत बनाने के लिए नर्सरी क्यारियों को पानी देना कम करें। बीज के अंकुरण के 3 दिनों के बाद, अंकुरित पौधों को आर्द्र गलन रोग से बचाने के लिए, 10 लिटर पानी में रिडोमिल - 15-20 ग्राम मिलाकर क्यारियों को भिगोएं। बुवाई के 25 दिनों के बाद 19:19:19 - 5 ग्राम + थायोमेथोक्साम - 0.25 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें या प्रोट्रे को कोकोपीट से 1.2 किलो प्रति ट्रे में भरें। प्रोट्रे में उपचारित बीजों को एक बीज प्रति सेल ऐसी बुवाई करनी चाहिए। बीज को कोकोपीट से ढँक दें और अंकुरण शुरू होने तक पॉलीथीन शीट से ढँक कर रखें (बुवाई के 5 दिन बाद)। 6 दिनों के बाद, प्रोट्रे को अंकुरित बीजों के साथ शेड नेट में अलग रखें। खेत में रोपाई :- जब पौधे 5-6 सप्ताह के हो जाए, तब वे रोपने योग्य होते हैं। जब 3-4 पत्तियाँ दिखाई देने पर और तना मोटा हो जाने पर पौधों का प्रत्यारोपण कर सकते हैं। अगेती किस्म के लिए पंक्ति से पंक्ति तथा पौध से पौध की दुरी 60 x 30 सेमी. तथा पछेती फसल के लिए पौध से पौध तथा पंक्ति से पंक्ति की दुरी 60 x45 सेमी. रखते हैं।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

फूलगोभी के लिए दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। बंदगोभी बलुई दोमट भूमि से लेकर मृतिका दोमट भूमि में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। जहां तक संभव हो अगेती किस्म को बलुई दोमट में तथा देर से पकने वाली किस्मों को मृतिका दोमट में उगाना चाहिए। भूमि ऐसी होनी चाहिए जिसमें जीवांश पदार्थ, वायु का आवागमन जल निकास व सिंचाई की उचित सुविधा हो। फूलगोभी को अधिक मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है इसकी अधिक पैदावार के लिए भूमि का काफी उपजाऊ होना अनिवार्य है इसके लिए प्रति हे.भूमि में 10 टन गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद और 50 किलो नीम की सडी पत्तियां या नीम की खली या नीम दाना पिसा हुआ चाहिए केंचुए की खाद 15 दिनों के बाद डालनी चाहिए। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के पश्चात 3-4 जुताई साधारण हल हैरों या कल्टीवेटर से की जानी चाहिये तथा साथ-साथ पाटा चला कर भूमि को समतल कर लेना चाहिए।

बीज की किस्में

फूल गोभी के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

अगेती किस्में :- अर्ली कुवारी, अर्ली पटना, पन्त गोभी - 2, पन्त गोभी - 3, पूसा दिपाली, पूसा कार्तिक, पूसा अर्ली सेन्थेटिक, पटना अगेती, 234 एस, 75-IC, 75-2C, 75-4C। मध्यमी किस्में :- नरेन्द्र गोभी 1, पंजाब जॉइंट पन्त शुभ्रा, इम्प्रूव जापानी, हिसार 114, एस-1,अर्ली स्नोबाल, पूसा हाइब्रिड 2, पूसा अगहनी पछेती किस्में :- पूसा स्नोबाल 2, पूसा के 1 स्नोबाल 16, पूसा स्नोबाल 1, दानिया, स्नोकिंग, पूसा सेन्थेटिक, विश्व भारती, बनारसी मागी, जॉइंट स्नोबालढ्ढ पूसा सनोबाल 1- फसल 100 दिन में पौध के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाहरी पत्ते ऊपर की तरफ सीधे और मुड़े हुए होते हैं। फूल बर्फ के जैसे सफेद होता है। इसकी पैदावार 90 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। पूसा सनोबाल के-1 - यह किस्म सनोबाल 1 से देरी में पकने वाली किस्म है। इसके बाहरी पत्ते ऊपर की तरफ सीधे और मुड़े हुए होते हैं। फूल बर्फ के जैसे सफेद होते हैं। इसकी औसत पैदावार 90 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। स्नोबाल 16 - यह देरी से पकने वाली किस्म है। फूल सख्त और आकर्षित छोटे रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 100-125 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। पंत शुभ्रा - यह जल्दी पकने वाली किस्म है और उत्तरी भारत में बीजी जाती है। फूल सफेद रंग के होते हैं और औसतन पैदावार 80 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। अर्ली कुंवारी - यह किस्म जल्दी पकने वाली, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 32 कि्ंवटल प्रति एकड़ है। पूसा दीपाली - यह आई ए आर आई द्वारा विकसित किस्म है। जल्दी पकने वाली किस्म है और उत्तरी भारत में बिजाई के लिए उपयुक्त है। यह मध्यम आकार की और सफेद रंग की होती है। इसकी औसतन पैदावार 48 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

बीज की जानकारी

फूल गोभी की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

बीज की मात्रा :- फूलगोभी की बीज की मात्रा उसके बुवाई के समय पर निर्भर करती है, अगेती 240 ग्राम और पछेती जातियों के लिए 200 ग्राम बीज एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। हाइब्रिड किस्मों के लिए बीज की मात्रा 100 -120 ग्राम एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। बीजोपचार :- रबी की फसल में गलने की बीमारी बहुत पायी जाती है और इससे बचाव के लिए बीज को मरकरी कलोराईड के साथ उपचार करें । इसके लिए बीज को मरकरी कलोराइड 1 ग्राम प्रति लीटर घोल में 30 मिनट के लिए डालें और छांव में सुखाएं । रेतली ज़मीनों में बोयी फसल पर तने का गलना बहुत पाया जाता है। इसको रोकने के लिए बीज को कार्बेनडाज़िम 50 प्रतिशत डब्लयु पी 3 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।

बीज कहाँ से लिया जाये?

फूलगोभी के बीज किसी विश्वसनीय स्थान से ही खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

फूल गोभी की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

फूलगोभी की अच्छी व गुणवत्तायुक्त फसल लेने के लिए भूमि में पोषक तत्वों की उचित मात्रा होनी चाहिए। उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण के परिणाम के आधार पर तय किया जाना चाहिए। फूलगोभीमे उचित पोषण प्रबंधन के लिए कम्पोस्ट खाद के साथ सिफारिश की गयी। उर्वरकों का अनुपात - एनपीके 50:25:25 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें। नत्रजन :- 55 किलो यूरिया प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत में मिलाएं और 27 किलो यूरिया रोपाई के 30 से 35 दिन बाद और खड़ी फ़सल में 27 किलो यूरिया 50 से 55 दिन बाद खेत में डालें। फॉस्फोरस :- 157 किलो एसएसपी प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। पोटाश :- 42 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (mop) प्रति एकड़ बुवाई के समय सम्पूर्ण मात्रा खेत में मिलाएं। सूक्ष्म तत्वों का महत्व :- बोरन - बोरन की कमी से फूलगोभी का खाने वाला भाग छोटा रह जाता है| इसकी कमी से शुरू में तो फूलगोभी पर छोटे-छोटे दाग या धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं एवं बाद में पूरा का पूरा फूल हल्का गुलाबी पीला या भूरे रंग का हो जाता है, जो खाने में कडवा लगता है| फूलगोभी और फूल का तना खोखला हो जाता है तथा फट जाता हैं| इससे फूलगोभी की पैदावार और गुणवता दोनों में कमी आ जाती है| इसकी रोकथाम के लिए बोरेक्स 5 से 8 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से अन्य उर्वरक के साथ खेत में डालना चाहिए| मॉलीब्डेनम - इस सूक्ष्म तत्व की कमी से फूलगोभी का रंग गहरा हरा हो जाता है तथा किनारे से सफेद होने लगती है, जो बाद में मुरझाकर गिर जाती है| इससे बचाव के लिए 600 ग्राम मॉलीब्डेनम प्रति की दर से मिट्टी में मिला देना चाहिए| इससे फूलगोभी का खाने वाला भाग अर्थात फल पूर्ण आकृति को ग्रहण कर ले और रंग श्वेत अर्थात उजला तथा चमकदार हो जाय तो पौधों की कटाई कर लेना चाहिए| देर से कटाई करने पर रंग पीला पड़ने लगता है और फूल फटने लगते हैं| जिससे बाजार मूल्य घट जाता है|

जलवायु और सिंचाई

फूल गोभी की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

पहली सिंचाई पौधे रोपने के तुरंत बाद करनी चाहिए। दूसरी सिंचाई उसके 4 से 5 दिन बाद करनी चाहिए। बाद की सिंचाई अगेती फसल में वर्षा ना होने पर प्रति सप्ताह तथा पछेती फसल में 10 से 15 दिन के अंतर पर करनी चाहिए। फूल निकलने के समय खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है। कुल मिलाकर 6 से 8 सिचाई की आवश्यकता पड़ती है।

रोग एवं उपचार

फूल गोभी की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

रस चूसने वाले कीट :- ये पत्तों का रस चूस कर उन्हें पीला कर देते हैं और गिरा देते हैं, साथ ही पत्ते भी मुड़ जाते हैं और ठूठी के आकार के हो जाते हैं। रस चूसने वाले कीट जैसे चेपे और तेले का यदि हमला दिखे तो इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 60 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि थ्रिप्स का हमला दिखे तो डैल्टामैथरिन  20 मि.ली. या 25%साइपरमैथरिन 5 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। चमकीली पीठ वाला पतंगा :- फूल गोभी का एक महत्तवपूर्ण कीड़ा है जो कि पत्तों के नीचे की ओर अंडे देता है। हरे रंग की सुंडी पत्तों को खाती है और उनमें छेद कर देती है यदि इसे ना रोका जाए तो 80-90 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। शुरूआत में नीम के बीजों का अर्क 40 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर फूल बनने की शुरूआती अवस्था में स्प्रे करें। 10-15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें। फूल के पूरा विकसित होने पर स्प्रे ना करें। इसके इलावा बी टी घोल 200 ग्राम की स्प्रे रोपाई के बाद 35 वें और 50 वें दिन प्रति एकड़ में करें। हमला अधिक होने पर स्पाइनोसैड 2.5% एस सी 80 मि.ली. को प्रति 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। सुंडी :- सुंडी पत्तों को खाती है और फसल को खराब करती है। वर्षा के समय स्पोडोपटीरा का नुकसान आम दिखाई देता है। यदि एक बूटे पर दो सुंडिया दिखे तो बी टी 10 ग्राम को प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर शाम के समय स्प्रे करें और बाद में नीम अर्क 40 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि नुकसान ज्यादा हो तो थायोडीकार्ब 75 डब्लयू पी 40 ग्राम को प्रति 15 ली. पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि पत्ते खाने वाली सुंडी का हमला हो तो स्पाइनोसैड 2.5% ई सी या 100 ग्राम एमामैक्टिन बेनज़ोएट 5 एस जी को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। सूखा :- इसके साथ फसल पीली पड़ जाती है और पत्ते गिर जाते हैं और सारा पौधा सूख जाता है। यह जड़ों के गलने से भी हो सकता है। इसे रोकने के लिए टराईकोडरमा बायो फंगस 2.5 किलो को प्रति 500 लीटर पानी में मिलाकर पौधे की जड़ों के नज़दीक डालें और फंगस के साथ होने वाले नुकसान की जांच करते रहें। पौधों की जड़ों में रिडोमिल्ड गोल्ड 2.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें और जरूरत के अनुसार सिंचाई करें। ज्यादा भारी सिंचाई ना करें। पत्तों के नीचे की ओर धब्बे :- पत्तों के नीचे की ओर सफेद या बादामी रंग के दाने बन जाते हैं। बीमारी कम करने के लिए खेत को साफ रखें और फसली चक्र अपनायें। यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो मैटालैक्सिल + मैनकोजेब 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर तीन स्प्रे करें। पत्तों पर धब्बे और झुलसा रोग :- बीमारी आने पर इसकी रोकथाम के लिए 20 मि.ली. स्टिकर के साथ मैनकोजेब या कॉपर ऑक्सीकलोराइड 300 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। ऑल्टरनेरिया पत्तों के धब्बा रोग :- सुबह के समय प्रभावित पत्तों को निकाले और जला दें और टैबूकोनाज़ोल 50 प्रतिशत + ट्रिफ्लोक्सीट्रोबिन 25 प्रतिशत 120 ग्राम की प्रति एकड़ में स्प्रे करें या मैनकोजेब 2 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। आर्द्र पतन - इस बीमारी में पौधे की जड़े सड़ जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए बीज को कैप्टान या थायराम से शोधित करके बोया जाये तथा नर्सरी को फारमेल्डीहाइड से उपचारित करना चाहिए। काला विगलन - इस रोग में शिराओं तथा पत्तियों का रंग काला या भूरा हो जाता है। पूरी पत्ती का रंग पीला हो जाता है और वह मुरझा कर गिर जाती है। इसके नियंत्रण के लिए बीज को बोने से पहले 50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 30 मिनट के लिए गर्म पानी से उपचारित करना चाहिए। पत्ती का धब्बा रोग इस रोग में पत्तियों पर गोल गहरे रंग के धब्बे बनते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 2.5 किलोग्राम इंडोफिल M-45 को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करना चाहिए। लालामी रोग - यह रोग बोरान की कमी के कारण होता है। इसके नियंत्रण के लिए नर्सरी में 0.3% बोरेक्स का घोल तथा रोपाई के बाद खेत में .5% बोरेक्स का घोल छिड़कना चाहिए। काला तार सादृश्य तना - इस रोग में फूलगोभी का तना जमीन की सतह पर के पास तार के समान काला पड़ जाता है। इसकी रोकथाम के लिए पौध की रोपाई के बाद 10 दिन के अंतर से 0.2% बेसीकाल के घोल से क्यारियों को सिंचित करना चाहिए। काली मेखला रोग - इस रोग में पत्तियों पर धब्बे बनते हैं। जिनके बीच का भाग राख की तरह धूसर रंग का होता है। इसके नियंत्रण के लिए बीज को बोने से पहले गर्म पानी 50 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री मिनट तक उपचारित करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवारों को नष्ट करने के लिए 2 से 3 बार निकाई गुड़ाई भी करनी चाहिए। निकाई गुड़ाई करते समय पौधों की जड़ों पर मिट्टी भी चढ़ा देनी चाहिए। रसायनिक नियंत्रण :- खरपतवारों के नियंत्रण के लिए टोक E 25, 5 लीटर दवा 300 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से रोपाई के बाद छिड़कना लाभकारी रहता है। बेसालीन 500 ग्राम सक्रिय अवयव को 400 लीटर पानी में घोलकर रोपाई से पहले छिड़कने से भी खरपतवार नहीं उगते।

सहायक मशीनें

जब फूल पूरे आकार के सफेद व कठोर हो जाते हैं, तो कटाई आरंभ कर देते हैं। कटाई गण्डासो से की जाती है। बोने के 4 या 5 माह बाद गोभी काटने के योग्य हो जाती है। गोभी की कटाई धीरे-धीरे मंडी की आवश्यकता अनुसार की जाती है।