शिमला मिर्च की खेती

सब्जियों मे शिमला मिर्च का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसको ग्रीन पेपर, स्वीट पेपर, बेल पेपर आदि विभिन्न नामो से जाना जाता है। आकार एवं तीखेपन मे यह मिर्च से भिन्न होती है। शिमला मिर्च का फल गुदादार, मांसल, मोटा, घण्टी नुमा कही से उभरा तो कही से नीचे दबा हुआ होता है।


शिमला मिर्च

शिमला मिर्च उगाने वाले क्षेत्र

भारत में शिमला मिर्च की खेती मुख्यतः हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरयाणा, जम्मू कश्मीर और झारखंड में होती है।

शिमला मिर्च की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

इसमें विटामिन सी एवं विटामिन ए तथा खनिज लवण जैसे; आयरन, पोटेशियम, जिंक, कैल्शियम इत्यादि पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।

बोने की विधि

30 से 35 दिन में शिमला मिर्च के पौध रोपाई योग्य हो जाते हैं। शिमला मिर्च की रोपाई 45 x 45 सेमी. की दूरी पर की जानी चाहिए। तराई क्षेत्रों में 50 x 50 सेमी पर रोपाई की जानी चाहिए।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करके 2-3 जुताई देशी हल या हैरों से करके पाटा लगा देना चाहिए।

बीज की किस्में

शिमला मिर्च के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

शिमला मिर्च की उन्नत किस्मों मे अर्का गौरव, अर्का मोहिनी, किंग ऑफ नार्थ, कैलिफोर्निया वांडर, अर्का बसंत, ऐश्वर्या, अलंकार, अनुपम, हरी रानी, आदि प्रमुख हैं।

बीज की जानकारी

शिमला मिर्च की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

सामान्य किस्म 750-800 ग्राम एवं संकर किस्म -200 से 250 ग्राम प्रति हैक्टेयर।

बीज कहाँ से लिया जाये?

शिमला मिर्च बीज किसी विश्वसनीय स्थान से  खरीदना चाहिए।

उर्वरक की जानकारी

शिमला मिर्च की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

10-15 टन गोबर की सड़ी खाद बुवाई के 1 माह पूर्व खेत में अच्छी तरह मिलाना चाहिए। सामान्यतः उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के बाद करना चाहिए। यदि किसी कारण मृदा जांच न हो सके तो 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस और 60 किलोग्राम पोटाश प्रयोग का प्रयोग उर्वरक के साथ करना चाहिए।

जलवायु और सिंचाई

शिमला मिर्च की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

शिमला मिर्च की फसल की सिंचाई गर्म मौसम में 7 दिन तथा ठण्डे मौसम मे 10-15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।

रोग एवं उपचार

शिमला मिर्च की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

1. पर्ण कुंचन - यह विषाणुजनित रोग है। इस रोग के कारण पौधों के पत्ते सिकुडकर मुड़ जाते है, तथा छोटे व भूरे रंग युक्त हो जाते हैं। ग्रसित पत्तियां आकार मे छोटी, नीचे की ओर मुडी हुई मोटी व खुरदरी हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए बुवाई से पूर्व कार्बोफ्यूरान 3 जी की 8 से 10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से भूमि में मिला देना चाहिए। पौध रोपण के 15 से 20 दिन बाद डाइमिथोएट 30 ईसी. या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसल  एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। यह छिड़काव 15 से 20 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार दोहराएं। फूल आने के बाद उपरोक्त कीटनाशी दवाओं के स्थान पर मैलाथियान 50 ईसी. एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। 2. फल सड़न - रोग के शुरूआती लक्षणों में पत्तियों पर छोटे-छोटे काले धब्बे बनते है। रोग के तीव्र होने पर शाखाएं ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती हैं। फलों के पकने की अवस्था मे छोटे-छोटे काले गोल धब्बे बनने लगते है। रोकथाम के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिये। मैंकोज़ेब 75 % डब्लूपी  ,डाइमेथोएट 30 ईसी  या ब्लाइटॉक्स का 0.2 प्रतिशत सांद्रता का घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

रोपण के के 30-45 दिन तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना अच्छे फसल उत्पादन की दृष्टि से आवश्यक है। कम से कम दो निराई-गुड़ाई लाभप्रद रहती है। पहली निराई-गुड़ाई रोपण के 25 एवं दूसरी 45 दिन के बाद करना चाहिये।

सहायक मशीनें

मिट्टी पलट हल, देशी हल या हैरों, खुर्पी, कुदाल, फावड़ा, आदि यंत्रों की आवश्यकता होती है।