केला की खेती

केला एक पौष्टिक फल है जो पूरे भारत में प्रसिद्ध है। केले से चिप्स, केला फिग, केला आटा, केला पापड, केला हलवा, केला जूस, केला पल्प, केला फल केनिंग, केला टॉफ़ी, केला मदिरा, केला शेम्पेन इत्यादि सामग्रियां तैयार की जाती हैं। केला उत्पादन के लिये ऊष्ण तथा आद्र जलवायु उपयुक्त होती है। जहाँ तापमान 20-35 डिग्री के मध्य रहता है, वहाँ पर केले की खेती अच्छी तरह से की जा सकती है। वार्षिक वर्षा 150-200 सेमी समान रूप से वितरित होना चाहिये। शीत एवं शुष्क जलवायु में भी इसका उत्पादन होता है। परंतु पाला एवं गर्म हवाओं (लू) आदि से काफी क्षति होती है।


केला

केला उगाने वाले क्षेत्र

तमिलनाडु, केरल, बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात तथा कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार। यह उष्णकटिबंधीय नम भूमी पसंद करता है और समुद्र स्तर से 2000 मीटर की ऊंचाई पर इसे उगाया जाता है। केले की खेती उपयुक्त किस्मों के चुनाव के ज़रिए नम उष्णकटिबंधीय से हलके शुष्क उप-उष्णकटिबंधीय मौसम में उगाई जाती है। सर्दियों में ठंड से केले की वानस्पतिक वृद्धि धीमी हो जाती है। कम पत्ते उगते है और उनकी निकलने की दर काफ़ी धीमी हो जाती है। साथ ही, सर्दियों के अंत तक पेड़ के सिरे काफी छोटे हो जाते है और गुच्छे का विकास भी उसी हिसाब से धीमा हो जाता है। इस देरी के कारण पत्तों का आकार छोटा हो सकता है जिसकी वजह से फल सूरज की तेज़ गर्मी से झुलस सकते हैं। उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सर्दी की वजह से खराब गुच्छे या अपूर्ण फल विकसित होते है। सूखे या कम तापमान की अवधि के दौरान विकास और फूलों की पैदावार कम होती है जिसके कारण उत्पादन अवधि में देरी होती है। 75-85% की सापेक्ष नमी के साथ 15C-35C के तापमान में अच्छी तरह से उगता है। 18C पर विकास शुरू होता है, 27 C पर इष्टतम और जब तापमान 38 C तक पहुँचता है तो बढ़वार रुक जाती है। यदि तापमान 12 C से नीचे गिर जाए तो सर्दी से नुकसान होता है। हालांकि केले सूरज की उज्ज्वल रोशनी में सबसे अच्छा बढ़ते हैं, मगर ज़्यादा तापमान की वजह से पत्तियां और फल को हानि हो सकती हैं।

केला की स्वास्थ्य एवं पौष्टिक गुणवत्ता

विटामिन ए, बी 12, बी 6, सी, डी, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, मैगनीशियम, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट। आदि पोषक तत्व पाये जाते हैं।

बोने की विधि

केला की रोपण के लिए गड्डे की तैयारी -खेत की तैयारी के बाद लाइनों में गढढे वैरायटी के आधार पर बनाए जाते हैं, मेड और कुंड बनाए और गड्ढों को (30 सेमी x 30 सेमी x 30 सेमी) आकार का बनाये और उन्हें अच्छी तरह से विघटित गोबर खाद/कम्पोस्ट खाद से भरें। रोपाई के लिये पौध की लम्बाई 30 से.मी., मोटाई 5 से.मी. तथा 4-5 पूर्णरूप से खुली पत्तियां आम तौर पर 45 सेमी x 45 सेमी x 45 सेमी के गड्ढे की आवश्यकता होती है। तैयार किए गए गड्ढों को सौरविकिरण के लिए छोड़ दें जिससे कीट को मारने में सहायता मिलती है, यह मिट्टी जनित रोगों खिलाफ प्रभावी है और वातन में मदद करता है।इन गड्ढों को 10 किलो गोबर खाद (विघटित), 250 ग्राम नीम केक और 20 ग्राम कार्बोफ्यूरान के साथ मिश्रित ऊपरी मिट्टी से भर दें।मेढों की रोपाई (30 x 40 सेमी आकार के) में रोपण के लिए निर्धारित बिंदुओं पर पर्याप्त रूप से आगे 0.6 मी x 0.6 मी x 0.6 मी के आकार के गड्ढे बनाये। बोने के समय एज़ोस्पिरिलम 25 ग्राम/पौधा और पीएसबी विघटनकारी जिवाणू 25 ग्राम/पौधा डालिये।केले की खेती में पौधे रोपण का सबसे उपयुक्त समय -केले की रोपाई का सबसे अच्छा समय मानसून काल होता है इसके लिए केले की पौधे रोपण 1 जून से लेकर जुलाई अंत तक की जा सकती है। अगस्त माह से पहले केले के पौधों की रोपाई कर लेनी चाहिए। लेकिन कांदा बहार में केले की रोपण का समय अक्टुबर, नवम्बर है 

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

केला की खेती के लिए मिट्टी केसी चाहिए - हल्की से भारी मिट्टी सबसे उपयुक्त है। गहरी, दोमट मिट्टी, जो जैविक सामग्री और उच्च नाइट्रोजन से संपन्न है, पर्याप्त फास्फोरस की स्तर और पोटाशयुक्त मिट्टी भी केले के लिए अच्छी है। अच्छी जल निकासी, पर्याप्त फलन क्षमता और नमी होनी चाहिए। खारी, ठोस, कैल्सियम से भरी मिट्टी केले की खेती के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आवश्यक पीएच - 6.5-8.0 कम पीएच की मिट्टी केले को पनामा रोग के लिए ज़्यादा खतरे में डालती है। रेतीली, नमकीन, पोषण की कमी और खराब निकासी वाली मिट्टी में खेती न करें। केले उगाने के लिए अत्यधिक अम्ल और क्षारीय मिट्टी उपयुक्त नहीं हैं। केले के लिए खेत की तैयारी - केले को बोने से पहले प्राकृतिक खाद के लिए ढैंचा या लोबिया वगैरा की फसल लगाई जा सकती है। नमभूमि और पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि की तैयारी की आवश्यकता नहीं है और गड्ढों को सीधे अपेक्षित अंतराल में बनाएं। जुताई विधि- रोटावेटर के प्रयोग से मिट्टी की एक अच्छी सतह बनाएं क्योंकि इस फसल को अत्यधिक पोषक तत्वों की और अच्छी नमी वाली बहुत उपजाऊ ज़मीन की ज़रूरत होती है; इसीलिए जुताई के समय इस्तेमाल कीजिए। गोबर खाद- 15 टन/एकड़ + 5 किलो खाद बैक्टीरिया (आख़री जुताई से पहले )। खेत को ब्लेड हैरो या लेजर लेवलर घुमाकर समतल किया जाता है (लेजर लेवलर के माध्यम से भूमि समतलन एक ऐसी सिद्ध प्रौद्योगिकी है जो कि सिंचाई के पानी के संरक्षण में अत्यधिक उपयोगी है। लेज़र भूमी समतलन का मतलब है खेत में एक निर्देशित लेज़र बीम का उपयोग कर वांछित ढलान की एक निश्चित डिग्री के भीतर क्षेत्र समतलन करना)।

बीज की किस्में

केला के लिए कौन कौन सी किस्मों के बीज आते हैं ?

 केला की उन्नत प्रजाति में खाने वाले केले बसराई, ड्वार्फ, हरी छाल, सालभोग, अल्पान, रोवस्ट तथा पुवन शामिल हैं। इसके अलावा सब्जी बनाने वाले केले कोठिया, बत्तीसा, मुनथन एवं कैम्पिरगंज वैरायटी हैं। 1.बसराई - उत्पादन 180.0 क्विंटल/एकड़ लगभग प्रमुख विशेषताएँ बेहतर गुणवत्ता का फल, बौनापन, जब पूरी तरह से परिपक्व हो जाए तो मीठी सुगंध। पकने पर छिलका हरे-पीले या पीले रंग का, पकने पर फल 4 मी.मी. जितना मोटा, पर सफ़ेद रेशों से युक्त मुलायम गूदा। गूदा मलाईदार, नरम होता है और इसका स्वाद अच्छा और मीठा होता है। 2. श्रीमंती - उत्पादन 250.0 क्विंटल/एकड़ लगभग प्रमुख विशेषताएँ काफी लंबा और मजबूत पेड़ जिस पर 18-20 किलो वज़न का गुच्छा पैदा होता है। फल बड़ा, चौड़ा, नोकदार और हलके हरे रंग का होता है। इसके पकान में इस्तेमाल के अलावा, यह बहुत पसंद किए जाने वाली सब्ज़ी है जिसके कई औषधीय गुण है। 3. ग्रेंड 9 (G -9 ) - उत्पादन 200.0 क्विंटल/एकड़ प्रमुख विशेषताएँ फल खाने के लिए स्वादिष्ट होते हैं और अच्छी फल संग्रह क्षमता। परिपक्वता पर आकर्षक पीला हरा रंग होता है। हर गुच्छा 10 से 12 हाथ लंबा और इसमें 175 से 225 फल होते है। 4. हरिछाल - उत्पादन 160.0 क्विंटल/एकड़ प्रमुख विशेषताएँ फल का छिलका मोटा (3 मीमी), लचिला, अंदर मुलायम सफेद फाइबर के साथ और आसानी से छिलने वाला होता है। गूदा मलाई जैसा सफेद, कुछ नम होता है। अच्छे स्वाद के साथ मीठा होता है। 5. ड्वार्फ कैवेंडिश - उत्पादन 200.0 क्विंटल/एकड़ प्रमुख विशेषताएँ रेगिस्तान की किस्म, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उच्च घनत्व रोपण के लिए महत्वपूर्ण है। पेड़ बौना होता है। फल बड़ा, लंबा घेर वाला, छिलका चौडा, हरा होता है और हरा रंग पकने के बाद भी कुछ हद तक बाकी रहता है। गूदा नर्म, मीठा, रसदार और सुगंध लुभावनी होती है। गुच्छे का वज़न 20-25 किलो, 12 हाथ, 150 या उससे ज़्यादा फल। 6. रोबस्टा - उत्पादन 200.0 क्विंटल/एकड़ प्रमुख विशेषताएँ यह केला पकने के बाद भी हरे रंग का होता है, यह केले के पेड़ों की बौनी किस्म में से एक है। बगीचे की ज़मीन के लिए अच्छा है। 7. सीओ - 1 - उत्पादन 200 क्विंटल/एकड़ लगभग प्रमुख विशेषताएँ हाइब्रिड किस्म, अच्छा स्वाद और मैदानों और पहाड़ी इलाकों में उगाने के लिए उपयुक्त। 8. लाल केला -उत्पादन 160.0 क्विंटल/एकड़ प्रमुख विशेषताएँ फल - लम्बा, धुरी के आकार का, छोटे डंठल, कुंद नोक, छिलका - मोटी, चमड़े जैसा, लाल रंग, आसानी से छिलता है। गूदा - नारंगी पीला, रसीला, मीठा, मध्यम लेकिन अलग स्वाद। म्लानि रोग के लिए काफी हद तक सहिष्णु। फसल की अवधि 18 महीने है। यह गुच्छी शीर्ष, फ्यूजेरियम म्लानि और सूत्रकृमि के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। अच्छी प्रबंधन व्यवस्था के ज़रिए गुच्छा 20-25 किलो वजन का पाया जा सकता हैं, 100 से ज़्यादा फल दे सकता है। 9. सफेद वेलची - उत्पादन 160.0 क्विंटल/एकड़ प्रमुख विशेषताएँ खाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला फल। पीले हरे छद्म तने के साथ मध्यम आकार की किस्म और इसे लाल डंठल रेखा से पहचाना जा सकता है, लम्बा फल, बहुत पतला कागज़ जैसा छिलका और ठोस सफेद गूदा जो बहुत मीठा होता है। औसत गुच्छा का वज़न करीब 12 किलो होता है और हर गुच्छे में लग-भग 150 फल होते है।

बीज की जानकारी

केला की फसल में बीज की कितनी आवश्यकता होती है ?

सामान्यतः 1 हैक्टेयर खेत में 3,333 पौधे रोपे जा सकते हैं

बीज कहाँ से लिया जाये?

केला के पौधे किसी विश्वसनीय किसी स्थान से खरीदना चाहिए! 

उर्वरक की जानकारी

केला की खेती में उर्वरक की कितनी आवश्यकता होती है ?

केला  की फ़सल में खाद एवं उर्वरक कुल आवश्यकता: प्रति पौधे के लिए 200 ग्राम एन, 60 ग्राम पी और 200 ग्राम।  रोपण के 30 दिन के भीतर- यूरिया- 82 ग्राम/पौधा, सिंगल सुपर फॉस्फेट- 365 ग्राम/पौधा, म्युरेट ऑफ पोटॅश- 83 ग्राम/पौधा। रोपाई के 75 दिन बाद यूरिया- 82 ग्राम/पौधा।  रोपाई के 120 दिन बाद यूरिया- 82 ग्राम/पौधा। रोपाई के 165 दिन बाद यूरिया- 82 ग्राम/पौधा, म्युरेट ऑफ पोटॅश- 83 ग्राम/पौधा।  रोपाई के 210 दिन बाद यूरिया- 36 ग्राम/पौधा। रोपाई के 255 दिन बाद यूरिया- 36 ग्राम/पौधा, म्युरेट ऑफ पोटॅश- 83 ग्राम/पौधा। रोपाई के 300 दिन बाद यूरिया- 36 ग्राम/पौधा, म्युरेट ऑफ पोटॅश- 83 ग्राम/पौधा। केले की फ़सल सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता की पूर्ति : सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकताएं- दूसरे और चौथे महीने में 10 लीटर पानी में 50 ग्राम जिंक इडीटीए + 50 ग्राम फेरस इडीटीए मिला कर छिड़काव करने से उपज और केले की गुणवत्ता में बढ़ौतरी होती है। पांचवे और सातवे महीने में 150 ग्राम गोबर खाद/पौधा में जिंक सल्फेट 15 ग्राम और फेरस सल्फेट 15 ग्राम मिट्टी में मिलाये। फर्टिगेशन- केले की अधिक उपज के लिए कुल मात्रा के 75 % नत्रजन और फास्फोरस (150 ग्राम) और कुल पोटास (60 ग्राम) ड्रिप विधि के द्वारा देने की सलाह दी जाती है।केले की फसल में अच्छे उत्पादन के लिए वृद्धि नियंत्रक- गुच्छों की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए 2,4-डी @ 25 पीपीएम का, अंतिम हाथ खुल जाने के बाद (25 मिग्रा/लिटर) छिड़काव किया जा सकता है। यह कुछ किस्मों के बीजों को भी निकालने में मदद करता है, उदाहरण- पूवन और सीओ-1।  चौथे और छटे महीने में रोपण के बाद सायकोसेल (1000 पीपीएम) से छिड़काव करना और छटे और आठवे महीने में प्लांटोज़ाइम 2 मिली/लिटर का छिड़काव करने से उच्च उपज प्राप्त करने में मदद मिलती है।  गुच्छे के पूर्ण विकास के बाद, पोटेशियम डाइहाइड्रोजन फॉस्फेट (0.5%) और यूरिया (1%) या 2,4-डी सोल्युशन (10 पीपीएम) से गुच्छों पर छिड़काव किया जाना चाहिए ताकि केले के आकार और गुणवत्ता में सुधार हो सके।

जलवायु और सिंचाई

केला की खेती में सिंचाई कितनी बार करनी होती है ?

केला  के खेतों में नमी बनी रहनी चाहिए। पौध रोपण के बाद सिचाई करना अति आवश्यक है। गर्मियों में 7 से 10 दिन के अंदर सिंचाई करनी चाहिए। सर्दियों में 12 से 15 दिन के अंदर सिंचाई कर लेनी चाहिए। अक्टूबर से फरवरी तक के अन्तराल पर सिचाई करते रहना चाहिए। मार्च से जून तक यदि केले के पौधों के पास पुवाल, गन्ने की पत्ती अथवा पॉलीथीन बिछा देने से नमी सुरक्षित रहती है, जिससे सिचाई की मात्रा भी आधी रह जाती है।  ड्रिप- ड्रिप सिंचाई अनुसूची (अच्छे परिणामों के लिए माइक्रोट्यूब के बजाय ड्रिपर या इनलाइन ड्रिपर सिस्टम का उपयोग करें) 1. रोपाई के बाद 1-4 सप्ताह- 4 लीटर/पौधा। 2. किशोर चरण 5-9 सप्ताह- 8-10 सप्ताह - लीटर/पौधा। 3. नाज़ुक वृद्धि चरण 10-19 सप्ताह- 12 लीटर/पौधा। 4. फूल-कली भेदभाव चरण 20-32 सप्ताह- 16-20 लीटर /पौधा। 5. तना निकलने का चरण 33-37 सप्ताह- 20 लीटर/पौधा और अधिक। 6. गुच्छा विकास चरण 38-50 सप्ताह- 20 लीटर/पौधा और अधिक। बाढ़- गर्मी के दिनों में 3-4 दिन और ठंड के दिनों में 7-8 दिन के अंतराल पर।

रोग एवं उपचार

केला की खेती में किन चीजों से बचाव करना होता है?

(i) गुच्छा शीर्ष रोग या (बन्ची टॉप) - इस रोग का कारण एक विचित्र किस्म का विषाणु होता है। अति तीव्र आक्रमण के समय इसकी पत्तियां छोटी तथा पतली हो जाती हैं, किनारे ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं, पत्तियां खड़ी दिखाई देती हैं तथा पौधे के ऊपरी सिरे की पत्तियाँ गुच्छे का रूप धारण कर लेती हैं। यह विषाणु माहू द्वारा फैलाया जाता है। इसकी रोकथाम के लिये माहू कीट के नियंत्रण हेतु डाईमेक्रान 250 मिली. साइपरमेथ्रिन 1.5 लीटर, थायोडान 1 लीटर में से किसी भी एक रसायन को 1,000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़कना चाहिए। प्रभावित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए तथा प्रभावित बाग से संकर नहीं लेने चाहिए। (ii) पनामा रोग - यह रोग पौधों को बहुत अधिक हानि पहुंचाता है। पौधा जब पांच माह का हो जाता है तो यह रोग अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। सर्वप्रथम नीचे की पुरानी पत्तियों पर हल्की पीली धारियां बनती हैं तथा पहले प्रकार के लक्षण में पत्ती पीली होकर लटक जाती है तथा दूसरे प्रकार के लक्षणों में पत्ती हरी रहती है परंतु लटक जाती है। प्रभावित पौधों की नई पत्तियां दागदार, पीली तथा सिकुड़नदार होती हैं। यह रोग फ़्यूजेरियम-आक्सीस्पोरियम नामक फफूँदी द्वारा होता है। यह पानी द्वारा फैलकर पौधों के संपर्क में आ जाता है। इस रोग की रोकथाम के लिए बाविस्टिन की 10 से 20 ग्राम मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर मिट्टी में मिलाना चाहिये। नत्रजन की मात्रा कम कर देनी चाहिये तथा प्रभावित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए और केले के बागों में नीम की खली 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करनी चाहिए। (iii) फल विगलन या झुलसा (एंथ्रेक्नोज) - यह ग्यियोस्पोरियम फ्यूजेरम द्वारा उत्पन्न होता है। यह नम तथा बरसात में काफी सक्रिय रहता है। इस रोग में फल, फूल तथा पत्तियां प्रभावित होती हैं। सर्वप्रथम पत्तियों पर काले रंग के धब्बे बनते हैं, फूल काले पड़कर सूख जाते हैं तथा गिर जाते हैं। फलों के काले धब्बे फल की वृद्धि के समय बढ़ते रहते हैं तथा फल सूखता जाता है। यह रोग बसराई तथा हरी छाल नामक जातियों में अधिक लगता है। इस रोग की रोकथाम के लिए फफूँदी नाशको का प्रयोग वर्ष में 2-3 बार करना चाहिए। प्रथम छिड़काव फूल आने के 2 सप्ताह पूर्व, तथा दूसरा छिड़काव 3 माह बाद करना चाहिये। इसके लिए कॉपर आक्सीक्लोराइड के 0.3% के घोल का छिड़काव भी उचित रहता है। गुच्छा बनते समय 30-75 ग्राम बाविस्टिन को 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। प्रभावित पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। (iv) अन्तर्विगलन (हार्ट रॉट) - किसान भाइयों जैसा नाम से ही प्रतीत होता है कि अंदर की पत्तियां गल जाती हैं तथा नई पत्तियों के निकलने में रुकावट पैदा होती है। पतियों की वृद्धि के साथ-साथ अंदर का गलना भी बढ़ता रहता है तथा पूर्ण फूल नहीं निकल पाता है। इस रोग का कारण भी एक फफूँदी होता है। किसान भाई इसकी रोकथाम हेतु पौधों को उचित दूरी पर लगाना चाहिए तथा जल निकास का उत्तम प्रबंध रखना चाहिए। तथा फल विगलन हेतु प्रयोग की जाने वाली दवा का प्रयोग करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

केला की फसल के खेत को स्वच्छ रखने के लिए समय पर निराई-गुड़ाई करने की आवश्यकता होती है, इससे पौधों को हवा एवं धूप आदि अच्छी तरह मिलता रहता है। रासायनिक तरिके से खरपतवार नियंत्रण के लिए 1. रोपाई से पहले ग्लायफोसेट 800 मिली/एकड़ 2. रोपाई के 3 दिनों के बाद ड्यूरॉन 200 मिली/एकड़ और 3.रोपाई के 30 दिन बाद पेराक्वाट 200 मिली/एकड़ काम में ले।

सहायक मशीनें

केला  के फल पेड़ पर गुच्छों के रूप में निकलते हैं। केले के गुच्छों को ही घैर कहते हैं। घैर को इस प्रकार पेड़ से काटा जाता है कि घैर के साथ लगभग 30 सेमी डण्ठल भी कट जाये।